Saturday, April 28, 2018

उन मौसमों की याद में....
कश्मीर सिर्फ समाचार ही रहा कई सालों तक.., दूरदर्शन पर समाचार के आखिर मे मौसम के समाचार सुनाये जाते। जिसमे भारी बर्फ़बारी सिर्फ कश्मीर मे ही तो होती थी. फिर पहली बार कश्मीर दिखाई भी दिया...।
सरकारी मकानो वाले मेरे मोहल्ले मे जाड़े की आमद उनके साथ ही होती . हर बरस ठिठुरते दिनों का बंदोबस्त लिए...., अपनी पोटलियों मे रेशा रेशा कश्मीर लिए...., वो मेरे शहर आते थे पश्मीना, फिरन ,पोंचू , जाड़े के दिनों मे मोहल्ले की हर लड़की कश्मीर की कली बन जाने की ज़िद बांध लेती।
ना नाम मालूम था तुम्हारा, ना पता. हमारे लिए तुम सिर्फ कश्मीरी थे, वैसे ही जैसे हम भोपाली...
वो नुक्कड़ से तीसरी लाइन को चौथे मकान तक हर साल जाड़ों मे बेहिचक आते रहे तुम . और
गुनगुनी धुप मे सुस्ताते बतियाते हम भी, तुम दिखाई ना देते तो एक बार तो ज़िक्र कर ही लेते,
सर्दियां देरी से आई हैं या झेलम एक्सप्रेस लेट है इस बार,
साल दर साल चलते रहे ये सिलसिले। और तुम हमारे लिए बदलते मौसम के क़ासिद बने रहे.
तुम तो इस बार भी पोटलियों मे वादियों की वर्दियां लिए गुज़रे होगे मेरी गली से. घर के आगे घंटी भी बजाई होगी देर तक.
पश्मीने मे लिपटा कश्मीर फिर लाये होगे इस बार भी.
दुख... केवल सब्र की ज़मीन नहीं... दुख जीवन की उर्वरा है... अनंत यात्रा के पड़ाव का साक्षात .पर दुख के बाद भी जीवन छल से भरा रहे ..... दुख के बाद भी दुनियादारी के सवाल हों... ..तो ये दुख आत्मा की नमी नहीं... व्यर्थ का विलाप है.. ...कोशिश हो कि दुख... सबक बनें..कि दुख की कोख जब अवसाद को जन्म दे रही हो... तब भी..टूटी फूटी सही जीवन में आस्था बनी रहे....
कि जब तलक सांस है भूख है प्यास है....
....वो बेवजह दूसरी जिंदगियों में आई मुश्किलों की ढेर सारी बातें करने लगी है....सिर्फ इसलिए कि खुद अुपनी जिंदगी से जूझने की हिम्मत जुटा सके, खुद अपनी, पीड़ा का पैरामीटर कुछ कम कर सके.....
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सड़क के मोड़ को दुख का कोना बना लिया है उसने...घर के मोड़ पर गाड़ी रोकता है, और चीख कर रो लेता है....ताकि सुबह से शाम तक घर दफ्तर में खुद को सामान्य दिखा सके....
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उस दफ्तर के लोग चुटकुले ज्यादा शेयर करते हैं अब... जानबूझकर करते हैं ये साफ दिखाई भी देता है......वो बहुत हंसती नहीं अब ....पर दोस्त कमबख्त कोशिश भी नहीं छोड़ते....
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वो पूरे दिन अपनी जान से दूर रहने के बाद, सिर्फ इसलिए अपने बच्चे से खुद को दूर कर लेती है....कि एक मां की सूनी आंखों में कहकहे लौटा देने का यही एक रास्ता है उसके पास......
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इंसानियत....किसी किताब में दर्ज नहीं होती ....
जीने का कोई तय सलीका नहीं होता.....
रोज ब रोज खुद सिखाती जाती है जिंदगी ......कि कैसे जीया जाता है......
खत....कि खता हुई थी...
उसे लिखना....जिसने चीख कर कहे गए लफ्ज़ भी हर बार अनसुने कर दिए थे....और ये जानते हुए लिखना कि ये खत भी अनदेखा रह जाना है...
पर सुना था किसी से कि लिखना मन की उदासियों में मुस्कान टांक देना है
सो लिख दिया ....खत का कायदा होता है ना कि पहली लाईन में लिखा जाता है तुम कैसे हो...तुम जैसे भी हो...मेरे हो... जैसा कोई फिल्मी डॉयलॉग नहीं कहना मुझे...नहीं कहना कि तुम मेरे थे ही कहां...
और सच कितनी तसल्ली है इस सच्चाई को मंजूर कर लेने में कि वो मोहब्बत थी ही नहीं कि ख्वाब की दुनिया हमेशा कांच की ही होती है ...किसी की मोहब्बत के भरम में जीना....और फिर उस भरम को अपने हाथों तोड़ देना....हिम्मत का काम होता है...
माऊंट एवरेस्ट पर बिना सांसों के चढने जितनी हिम्मत....
कि बेअसर रहना उस निगाह से जिसे देखने की हसरत में आप जाने कितनी दोपहरें शाम कर चुके हों....बेताल्लुक रहना, उस छुअन से...जो चाय का कप संभालते हुए ...बेखुदी में हथेलियों पर दर्ज रह गई थी..बेफिक्र रहना उस ख्याल से ...कि जाने आज फेसबुक की तस्वीर पर उसका दिल चस्पा होगा भी या नहींआंसूओं की बारिश...दिल के दर्द धो देती है...कई बार सुना है
कि इसी रास्ते से मन का आसमान साफ होता जाता है....
तो खुल गया है आसमान...धूप निकल आई है.....
कि तुम्हारे आने और जाने के बीच सदियों के फासले भी मेरी परवाह का हिस्सा नहीं अब....कि किसी और मोहब्बत में मुब्तिला प्यार करने वाले शख्स को देखकर ये अफसोस भी नहीं कि तुम ऐसे क्यूं नहीं हुए....
छोड़ देना जितना आसान...उतना मुश्किल भी तो होता है.....
पर मुश्किलों से जिंदगी आसान होती है....तो ये जो खत के आखिर में खाली स्पेस है ना.....जिंदगी में भी ऐसा ही खाली स्पेस छोड़ दिया है.....
कभी भर पाई तो उसे आसमानी रंग से भरूंगी......
तुम अब ख्याल में नहीं हो....
यकीन मानों फार्मली कह रही हूं....... अपना ख्याल रखना.....
( खत लिखिए....जरुर लिखिए कि लाल डिब्बे की उदासी टूटे)
....
आसान नहीं होता...
सिसकियों से टूट रही खामोशी में 
हौसले का मरहम रख पाना...

जब सात्वंना देते हाथ 
संभालते कंधे 
सब रीत चले हों 
बीत चले हों...
तब आंसूओं को समेटकर 
झूठी मुस्कान चेहरे पर लाना 
आसान नहीं होता...

आसान नहीं होता 
फिर मंदिर में सांझ का दीपक लगाना 
भगवान से कह पाना, 
तुम्हारी यही मर्जी थी शायद

आसान नहीं होता...
उसी दुनिया में जीना...खड़े होकर 
चल पाना...जहां रस्ते, गली, चौराहे पर 
तुम्हारी याद ठहरी है....

आसान नहीं होता 
तुम्हारी तस्वीर को
खुद अपनी आंखों से
छिपा जाना, 
कि तुम्हे तस्वीर बनते नहीं देखना था हमें.....

आसान नहीं होता...
दुखों का पहाड़ चढकर 
फिर उसी दुनिया में लौट पाना ...
जहां, जीवन नश्वर है...
इस सबसे बड़े सच से साक्षात के बाद भी
छल अपने पैर पसार ही लेता है.....
कितने सवाल होते हैं, जिनके जवाब जिंदगी के पास भी नहीं होते. मैं चाहती हूं कि मेरी जिंदगी की रुठी छूटी ख्वाहिशों का सिक्वल ना बने तुम्हारी जिंदगी। मैं चाहती हूं कि मेरे हादसे तुम्हारा तजुर्बा ना बनने पाएं. मैं चाहती हूं कि अपनी वसीयत में तुम्हारे नाम खिलते गुलाब, चहकती चिड़ियाएं ऊंघते देवदार लिख जाऊं कि ये दिल नहीं तोड़ेंगे कभी। 
और तुम्हारे वो मासूम सवाल..कि जिनके हल गूगल के पास भी नहीं है. ये जिंदगी के सवाल, जिनके जवाब मुझे भी नहीं मिले आज तक वो तुम्हारे साथ छोड़े जाऊंगी कि तुम ढूंढ लोगे जवाब ..उम्मीद है मुझे.

बीतते बेदर्द दिसम्बर का एक ख्याल है बस... वक्त गुज़रा है हम नहीं गुज़रे...
  1. कुछ लम्हे अपने नाम के हो 
  2. कोई इत्मीनान की शाम के हो
  3. लिखूं किताब मन की अबकि 
  4. नीदों को मिले मीठी थपकी
  5. मैं दूर देस को जाऊं अब 
  6. मैं दिल के साज़ पर गाऊं अब
  7. जो संघर्षों में रुठ गए 
  8. जो हाथ छुड़ाकर छूट गए
  9. उस बीती को मैं बिसार भी दूं 
  10. जो साथ खड़े.,उनको देखूं 
  11. जो साथ चले उनको जानू
  12. मुझे वादी में सुस्ताना है 
  13. सागर पर दौड़ लगाना है....
  14. बस इतनी सी ख्वाहिश मेरी,
  15. दुनिया से जब रुखसत पाऊं 
  16. इतनी मोहलत बस मिल जाए .....
  17. शिफाली
स्कूल बस में, उम्मीद चढती हैं...सपने चढते हैं....
स्कूली बस के साथ हुए ऐसे हादसे हमेशा सिर्फ खबर ही नहीं होते। वो डर बनकर आते है। वो कानों से चढते है और आंखों से उतरते है आंसू बनकर। स्कूल बस में दुनियादारी नहीं चढती। स्कूली बसों में मासूमियत सवार होती है। डीपीएस की उस बस में सवार 12 बच्चे भी भीड़ भर ही तो नहीं थे । वो बच्चे फिक्र थे । सपने थे। उम्मीदें थे। और कहीं कहीं जीने की इकलौती वजह भी थे। वो खिलें पूरे रंग और ताब के साथ इसी कोशिश में तो सड़कों पर दस से पांच की दौड़ लगी हुई है। फिर कौन इन मासूम हसरतों को। जीने की इन इकलौती वजहों को, मौत वाली बसों में सवार कर जाता है? क्या जिम्मेदार सिर्फ बेकाबू नीली पीली बसों के ड्राइवर हैं? क्या जिम्मेदार नो एंट्री में सुबह सुबह चले आने वाले टैंकर हैं? हादसों के बाद जिम्मेदारियां तो हर बार तय होती हैं। सख्ती होती है लेकिन हादसे तो फिर भी होते हैं। उन बच्चों के लिए दुख के साथ बस इतना सा संतोष है हाथ, कि इस बार उन बच्चों में आपके घर का चिराग नहीं था। पर एक भरोसा ही तो है। जिस भरोसे पर बच्चे उस हादसे के बाद आज सुबह फिर बसों में सवार हुए हैं। फिर स्कूल गए हैं। और उसी भरोसे की डोर थामें दोपहर तक घर भी लौट आएंगे । लेकिन यकीन मानिए ये हादसा भरोसे की इस डोर को कमजोर कर गया है...
खत लिखना आपसे ही सीखा था....यहां सब कुशल मंगल है...पत्र यहीं से शुरु होता है हमेशा 
चाहे मंगल कहने को बस मंगलवार ही हो तुम्हारे पास..आपसे ही सीखा 
.नहीं बाबा, आप कोई टेंशन नहीं लेना...वाकई सब कुशल मंगल से है...
पर जाड़े के ये दिन नहीं गुजर रहे....तीन दिन हो गए 
दीदी के हाथ का स्वेटर ही पहनी हुई हों....उतारती हूं तो लगता है कि घर से दूर निकल आई हूं कहीं पहन लेती हूं, तो अम्मा के साथ सिगड़ी तापने लगती हूं बरामदे में बैठकर....
पर बाबा यहां एक ही मौसम है....बस एक मुंजमिद खामोशी .....

--
बाबा, चांदनी फूल आई होगी अब तो...
गुजरते जाड़े में आम पर बौर भी आ जाएगा....
भाई से कहना..मेरे हिस्से वाली कैरियां 
वो ही रख ले...
अबकि मैं लड़ने नहीं आऊंगी उसके पास
मैं भी क्यूं आऊं खट्टी झूठी कैरियां खाने इतनी दूर वहां
बाबा....पर आप भी झूठ क्यूं कहते थे, 
कि तू पास ही रहेगी, 
आंगन के आम जितनी पास

----
अम्मा से कहना, तसल्ली कर ले
अब कैंची की तरह ज़बान नहीं चलती मेरी 
अच्छी लड़कियां जोर से नहीं हंसती
अच्छी लड़कियां गाना नहीं गाती 
अच्छी लड़कियां खिड़की पर नहीं आती 
अच्छी लड़कियां.., सच नहीं कह पातीं
कुछ नहीं भूली हूं 
और सच कहूं कुछ याद भी नहीं है...
कि कब जोर से हंसी थी आखिरी बार...
कब जोर का गाना गाया था...
खिड़की खुल भी जाए इत्तेफाक से तो किसी दीवार के आगे 
ही खुलती है 
.......

बाबा, 
वो दादी का पलंग...अलमारी, 
वो पुराना कमजोर सोफा 
सब महफूज़ है ना घर में 
फिर मैं कैसे छूट गई हूं.....
शिफाली

( नोट-.....ताकि हमारी जिंदगी में पोस्टकार्ड और अंर्तदेशीय बनें रहें....चिट्ठी लिखिए कि लाल डिब्बा उदास है...
पुत्री का खत पिता के नाम
द्वारा- शिफाली हूं

खत लिखना आपसे ही सीखा था....यहां सब कुशल मंगल है...पत्र यहीं से शुरु होता है हमेशा 
चाहे मंगल कहने को बस मंगलवार ही हो तुम्हारे पास..आपसे ही सीखा 
.नहीं बाबा, आप कोई टेंशन नहीं लेना...वाकई सब कुशल मंगल से है...
पर जाड़े के ये दिन नहीं गुजर रहे....तीन दिन हो गए 
दीदी के हाथ का स्वेटर ही पहनी हुई हों....उतारती हूं तो लगता है कि घर से दूर निकल आई हूं कहीं पहन लेती हूं, तो अम्मा के साथ सिगड़ी तापने लगती हूं बरामदे में बैठकर....
पर बाबा यहां एक ही मौसम है....बस एक मुंजमिद खामोशी .....

--
बाबा, चांदनी फूल आई होगी अब तो...
गुजरते जाड़े में आम पर बौर भी आ जाएगा....
भाई से कहना..मेरे हिस्से वाली कैरियां 
वो ही रख ले...
अबकि मैं लड़ने नहीं आऊंगी उसके पास
मैं भी क्यूं आऊं खट्टी झूठी कैरियां खाने इतनी दूर वहां
बाबा....पर आप भी झूठ क्यूं कहते थे, 
कि तू पास ही रहेगी, 
आंगन के आम जितनी पास

----
अम्मा से कहना, तसल्ली कर ले
अब कैंची की तरह ज़बान नहीं चलती मेरी 
अच्छी लड़कियां जोर से नहीं हंसती
अच्छी लड़कियां गाना नहीं गाती 
अच्छी लड़कियां खिड़की पर नहीं आती 
अच्छी लड़कियां.., सच नहीं कह पातीं
कुछ नहीं भूली हूं 
और सच कहूं कुछ याद भी नहीं है...
कि कब जोर से हंसी थी आखिरी बार...
कब जोर का गाना गाया था...
खिड़की खुल भी जाए इत्तेफाक से तो किसी दीवार के आगे 
ही खुलती है 
.......

बाबा, 
वो दादी का पलंग...अलमारी, 
वो पुराना कमजोर सोफा 
सब महफूज़ है ना घर में 
फिर मैं कैसे छूट गई हूं.....
शिफाली

( नोट-.....ताकि हमारी जिंदगी में पोस्टकार्ड और अंर्तदेशीय बनें रहें....चिट्ठी लिखिए कि लाल डिब्बा उदास है...
शिफाली पांडेय

ये सूनी सूनी दोपहरें..
ये बासी खाली खाली दिन 
यूं लौट के आते हैं जैसे
जो बीत गया कल
आज वही 
है राग वही और साज वही 
और खुद से खुद की 
बात वही..
खुद से खुद का फिर लड़ जाना 
टकराना टूट बिखर जाना 
फिर खुद से कहना 
मान भी ले...
अब चल भी दे 
और जान भी ले...
जो बीत रहा तुझमें तू है 
ये दुनिया फानी हर सूं है...
ये लफ्ज़ तूझे देंगे मानी
जो बीत गया फिर बीतेगा
ये रात कोई तो जीतेगा ...

है राग वही और साज वही 
और खुद से खुद की 
बात वही..
खुद से खुद का फिर लड़ जाना 
टकराना टूट बिखर जाना 
फिर खुद से कहना 
मान भी ले...
अब चल भी दे 
और जान भी ले...
जो बीत रहा तुझमें तू है 
ये दुनिया फानी हर सूं है...
ये लफ्ज़ तूझे देंगे मानी
जो बीत गया फिर बीतेगा
ये रात कोई तो जीतेगा .
कुहासी सुबहें दोपहरें निगल लेती हैं 
शाम का रातों से रदोबदल हो जैसे

पूस का महीना बीत गया है 
सुनते हैं कि दिन बड़े हो जायेंगे अब 
लेकिन रहेंगे तो बेमानी ही

फिर कुछ सपने घोड़ी चढ़ जायेंगे 
और फिर मुल्ताबी रेह जायेंगे कच्चे पक्के इश्क़

उम्मीदों के मांजे और मज़बूत करेंगे अबकी फिर 
और टूटा सिरा हाथ मे लिए फिर कहूँगी खुद से 
कि अपने हाथ यही तो आना था

फिर सूरज के दिन आएंगे तो मे भी आवाज दूंगी तुम्हे 
बादलों के इस शामियाने के उस पार तुम सुन लोगे ना

वो पिछले मोहल्ले के पीपल से कई बार तुम्हारी गवाही ली है
Shifalee
जो, मैं भी जी ही लेती 
सिल्क साड़ी का सपना...
चूड़ियों में खनकना...
पायलों में ठुमकना....
तुम्हे देखती 
थोड़ी पलकें झुकाकर
फुदकती मटकती
मैं चोटी घुमाकर....
हौले हौले में गाती 
बेवजह मुस्कुराती 
मैं यूं बोलती जैसे 
चिड़िया हो चहकी
मैं ऐसे गुजरती
रात रानी ज्यूं महकी...
कि कंधा पकड़कर मैं बाइक पे आती
पहले शर्ट खींचती फिर मैं सैल्फी खिंचाती
मगर ये हो ना सका....
मगर ये हो ना सका...
और अब ये आलम है.....
कि देखूं में अपनी किताबों का सपना
कि रूटीन है मेरा लड़ना झगड़ना
कि हाथों में मैने, टू डू लिस्ट थामी
कि पैरों में हर दम ही रहती सुनामी
कि पलकों से पहले, मैं चश्मा संभालू 
ठहाकों में हंस लूं मैं जोरों से गा लूं 
कि कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी मैं
तुम्हारी ही खातिर तो जग से लड़ी मैं....

इसे देखो....इसे जानों, फिर समझो ये कहानी
इन फितूरी, औरतों की कीमत...
तुम क्या समझों जानी....
----शिफाली
धरती जिस रंग की चादर पहनें,
गुनगुनी धूप में सो जाती है....
किताब में जो महफूज़ रक्खे हैं,
तुम्हारे दिए हुए
उन फूलों का रंग भी तो वही था ना...
ये और बात कि वो फूल तुम्हारे जज़्बात की आधी बयानी रहे..
उसी रंग की चूनर ओढे 
उतरते रहे मेरी उम्र के तमाम बरस...
हां वही रंग...कि जिसे पहनकर बित्ते भर की नोनी दौड़ लगाती है...
हां वही रंग कि जिसमें, हथेली रंगती है, घर की देहरी पे छूट जाती है 
उसी रंग से रंगे थे पांव....
बाबूजी जब रोए थे ....
वही रंग जिसनें, बंजर नीदों में सपने बोए थे....
हां वही रंग फिजाओँ में लौट आया है....
मेरी लकीरों में लिक्खा....
तुम्हारे नाम का रंग

...............शिफाली
मौके पर ही मौत ना हुई, तो मौत का मतलब ही नहीं 
मानवता शर्मसार ना हो, तो काहे की मानवता 
राजनीति में कैसी भी बात, कोई नेता नहीं वक्त बताता है
और जवाबदेही इस शब्द के पापा प्रशासन अंकल हैं....
बात या तो अहम होती है, या सबसे बड़ी, वरना कोई बात बात नहीं होती
निश्चित ही..., नेता की जुबान से छूटा, रिपोर्टर ने लपका 
डॉक्टर ईलाज कम लापरवाही ज्यादा करते हैं...
महिला के साथ बदसलूकी यूं जुड़ा है जैसे शरीर के साथ सांसे

# खबर की दुनिया में शब्दों की अजब गजब दुनियां...श्रंखला भाग एक।
बेशक, जिंदगी आपके हिस्से सिर्फ और सिर्फ सवाल ही छोड़ रही हो... हर दूसरा दिन हर्डल रेस का नया टारगेट सेट करने आता हो ...हर दूसरा फोन कॉल मुश्किल की घंटी बन जाता हो....तब भी कि जब ये यकीन होने लगे कि पीपल में मन्नतें नहीं सिर्फ धागे बांध आए थे ....और आसमान के उस पार जो भेजीं थीं मुरादें वो तो कबकि खला में खो गई होंगी ..., ...जिंदगी की आइस पाइस में जब रिश्ते ढूंढने से भी ना मिलें..... .....तो पहाड़ से भारी इन दिनों को यूं गुज़ारिए कि हर बोझ से बेअसर रहे दिल.....
कि जिस्म और जिंदगी से पल भर की भी बेरूखी का ख्याल ना हो ..... दफ्तर से लौटने के बाद जो आपकी एक आवाज पर घर का इत्मीनान बनें दौड़े आते हैं ...
किसी सूरत उनका ये भरम ना टूटने पाए कि सुपर मैन....सुपर वुमन कभी हारते नहीं....

ये चढते दिन की तस्वीर 
हकीकत है हमारे जीवन की
कि जब वक्त भी तल्ख धूप लाए
कुछ बेहद अपने छूट जाएं राह में ...
इम्तेहान हर दिन की कहानी हो 
और नतीजों की कोई तय तारीख नहीं ....
हां तब भी....
तुम मुस्कुराना यूं हीं....
कि साथ साथ करेंगे जिंदगी से दो दो हाथ 
और बाज़ी हमारे नाम होगी.....
.....

नींद खुलना हमेशा जागना नहीं होता 
कितने बरस नींद में ही गुजर जाते हैं 
फिर जैसे नींद के ख्वाब दरक जाएं 
टूटते हैं भरम 
और आंखे खुल जाती हैं....
सुबह मैने एक लकीर मिटाई और अपनी जिंदगी में हौसला...हिम्मत, भरोसा, मोहब्बत...बनकर आए तमाम मेल्स को शुक्राना भेजा.....शाम बेटे के स्कूल की डिमांड पर खास पिंक कलर की टी शर्ट खरीदने जब बाजार गई तो एक नई लकीर से सामना हुआ....रंगों की लकीर... पूरे बाजार में लड़कों, खास कर किड्स बॉयज़ के लिए पिंक कलर की टी शर्ट पूरे बाजार में नहीं मिली...और इस दलील के साथ कि कंपनियां किड्स बॉयज़ के लिए पिंक टी शर्ट बनाती ही नहीं हैं.....और इसकी एक मात्र वजह, पिंक लड़कियों का कलर है....देखिए फर्क की बुनियाद कितने धीरे से हमारी दुनिया में दाखिल हो रही है....गुड़िया तेरी, सुपरमैन मेरा.....गुलाबी तेरा, आसमानी मेरा ....देहरी तेरी,आसमान मेरा ....रसोई तेरी, दफ्तर मेरा ....उफ्फ

                  वो जिन्हे जुबां की ज़मीन नहीं मिल पाई 
              वो जो इकरार की मंजिल तक आते छूट गए 
           वो जो इसरार बनें....और रुठ गए 
वो जो चुभते हैं दिल में किरचें बनकर 
हां , .ये उन्ही लफ्ज़ों के इज़हार का दिन है....
                                            तो हंसो मत लड़की 
                                       घर घर खेलते हंसी थी जोर से
                                     और मोहल्ले की सबसे शैतान लड़की
                                 करार दी गईं तुम
                                  क्लास रुम में हंसी 
                            तो कहा गया तुम्हे टॉम ब्वाय
                       ब्वॉय फ्रेंड भी इसी लिए तो छूटे सारे
                         कि तुम ना लजाई, ना मुस्कुराई,
                   बस लगाती रहीं जोर का ठहाका
               दफ्तर में तुम्हारे ठहाके
                तुम्हे संदिग्ध के दायरे में ले आए
                 ब्याह की वेदी पर हंसी तुम जोर से
             मां को कर गईं शर्मिंदा
                 तो हंसो मत लड़की
          कि तुम्हारी हंसी
           सभ्यता के बांध तोड़ती है
         तुम्हारी हंसी,
              से दरकते हैं संस्कारों के तटबंध
          हंसती हो तो देवी नहीं रह जाती तुम
      तुम्हारी हंसी
        तुम्हे, शूर्पणखा बनाती है......

    शिफाली 
सुर्ख गुलाब संभाल लेना किताबों में
सिर्फ कांटे भेजना...
कि उनकी चुभन
बेख्याली से बाहर ले आएगी मुझे
टूट जाएंगे भरम
तोहफे में शिकवे भेजना
खत में शिकायतों का मजमून ...
भेजना...आंसू
अफसोस भेजना....
इंकार भेजना मुझे.....
मोहब्बतें नहीं,
जी भर के सदमें भेजना मुझे ....
कि जानां....आओ,
मोहब्बत के महीने की फितरत बदल दें हम

तुम इस इतवार का एतबार मत करना.....

                नींद इस आवाज़ पर टूटे की दिन चढ़ आया है
                  सूरज पर चढ़ी हो गुनगुनी चाय 
          रसोई नाश्ते मे ही निपट सुस्ता रही हो
          जब classified भी इत्मीनान से पढे जाएं
           जिस दोपॅहरी सिर्फ सुकून के सपने गढ़े जाएँ..
            और लूप मे केह रही होंगी गंगूली
          आपकी याद आती रही....
                  रात भर....
         तुम इस इतवार का एतबार मत करना.....

# मुहब्बत वाले दिन के सद्के

      सुन कर अनसुनी कर दी गई दरवाजे की दस्तकें... जानकर मिस कर दिए गए कॉल... मैने नही देखा झरोखे से बाहर.. कि        तुम्हारे होना अब होना नही है मेरे लिए ..कि इतने बरस... .वक्त फिसला नही था हाथों से. ं... मुट्ठी में जमा होता रहा               तजुर्बा बनकर....तुम्हारे इंतज़ार में जागती नदी अभी अभी करवट लेकर सोई है.... आसमान का शामियाना उतारा जा          रहा    है.हौले हौले.. ....सितारों की बारात खामोश लौट चुकी है....और वो सारे पुल समेटे जा चुके हैं.... कि जिन पर किसी     हीर     को पूरी सांझ रांझे को तकते रहना था.....
   आसां नही होता प्यार को... प्यार से कह पाना.... अलविदा..
एक अधूरा कहानी का हिस्सा....
# मुहब्बत वाले दिन के सद्के

तो सांसे थम जाएंगीं.....

       पर्वत पर चढना कठिन नहीं होता 
      मुश्किल नहीं होता धीरे धीरे 
     एक समतल पथ पर 
     सदियों का सफर तय कर लेना 
     कठिन है तो केवल 
     परिक्रमा
    सूर्य के चारों तरफ घूमती पृथ्वी भी
     तो कभी ऊबती होगी
    और खुद से पूछती होगी,
     कहां से कहां पहुंची,
     कोई पूछ ही ले,
    तो क्या बताऊंगी
     कि ये परिक्रमा ना मेरी मर्जी का पथ है
     ना मेरी प्रार्थना
     ना प्रेम की डोर कोई...
    पर इस परिक्रमा से ही
   ऊगने हैं दिन , डूबनी हैं रातें
     कि सुस्ताने ठहर गई
    तो सांसे थम जाएंगीं.....


 ..................... शिफाली 

वो बरसों लूप मे सुने जाते हैं...

      रसोई मिलाकर कुल जमा साढे तीन कमरों के उस घर में....दीवारें..सिर्फ लिहाज़ को थी...कि यहां से पड़ोस शुरु होता है          और यहां घर की सरहद खत्म......बाकी लड़कियों के नी लेंथ स्कर्ट की तरह आधी ढंकी खिड़कियां...तो जैसे हर वक्त      बात      करने को बेताब....... सड़क पार के उस घर में तय वक्त पर बत्ती का जलना फिर बुझ जाना....कौन जानें..रजामंदी थी      या इंकार......,मोटरसाईकिल की आवाज़ पर बढती धड़कनें..इश्क थी कि दहशत..कौन जान पाया....पर ऊंघते मोहल्ले में       दस बजे....जब कमल शर्मा भारी आवाज़ में कहते ... गीत के बोल जांनिसार अख्तर के हैं और संगीत खय्याम का....तो जाने            कितने दिल सज्दे में हो जाते....चोरी चोरी कोई आए....चुपके चुपके....सबसे छुपके ....ख्वाब कई दे जाए....
                        सुनते हैं कि जो इश्क इज़हार नहीं पाते...वो बरसों लूप मे सुने जाते हैं...

तुम्हारे नाम का रंग

           
    धरती जिस रंग की चादर पहनें,
      गुनगुनी धूप में सो जाती है....
     किताब में जो महफूज़ रक्खे हैं,
     तुम्हारे दिए हुए
     उन फूलों का रंग भी तो वही था ना...
     ये और बात कि वो फूल तुम्हारे जज़्बात की आधी बयानी रहे..
         उसी रंग की चूनर ओढे
     उतरते रहे मेरी उम्र के तमाम बरस...
    हां वही रंग...कि जिसे पहनकर बित्ते भर की नोनी दौड़ लगाती है...
    हां वही रंग कि जिसमें, हथेली रंगती है, घर की देहरी पे छूट जाती है
    उसी रंग से रंगे थे पांव....
     बाबूजी जब रोए थे ....
     वही रंग जिसनें, बंजर नीदों में सपने बोए थे....
      हां वही रंग फिजाओँ में लौट आया है....
     मेरी लकीरों में लिक्खा....
       तुम्हारे नाम का रंग
...............शिफाली

वो बायस्कोप बचपन वाला..

वो बायस्कोप बचपन वाला...जिसमें रुकी हुई चिड़िया भी उड़ती मालूम होती थी...गुजरे कोई दस पंद्रह बरस बायस्कोप की किसी चिड़िया की तरह ही उड़ गए...उस खामोश इमारत से पूछती हों, तुम तो जानती हो.. तलाशी लो ना कभी....तुम्हारी देहरी दरवाज़ें पे दर्ज होंगे , मेरी भागती दोपहरों और जागती रातों के सबूत ....किसी दीवार पर...पसीने से तर मेरे हाथों के निशां मिल जाएं शायद...इमारतें तो गवाही भी होती हैं ना वक्त की.....इतिहास तो तुम इमारतों से ही रंगा हुआ है....
इमारत बोली तुम्हारे पसीने पर तो बरसों पहले मनो धूल जम चुकी ..सीलन की बू आने लगी है अब तो....
....हजारों हज़ार किलोमीटर की वों सड़कें...गांव कस्बों शहरों को नापते दिन....उन सड़कों से पूछती हूं...तुम गवाही दे सकती हो मेरी रफ्तार की...बोलीं..., सड़कों की याददाश्त तो यूं भी बहुत कमजोर होती है...
गुजर चुके काफिले सिर्फ गुबार छोड़ते...उन काफिलों का दस्तावेज नहीं होतीं सड़कें....
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फिर वो चेहरे जो मेरे साथ साथ चले, कुछ पीछे छूटे कुछ आगे बढे....कुछ वो जिनसे खुद में छूटी खड़ी हूं कई बरसों के फासले पर....उन चेहरों से चाहकर भी ना पूछा गया मुझसे...जो जिंदगी की सांप सीढी के साथ अपना बर्ताव बदलते रहे...
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किससे कहूं कि . जिसे मुकाम कहते हैं ना... वहां निशां छोड़ने को ही थी कि पीछे से कोई बेहद करीबी आवाज आई ....और लौटना पड़ गया था मुझे.....बस एक लम्हे की खता थी....
खैर....अब उम्र का हासिल ये कि जिंदगी की किताब तुम्हारे हिस्से हर बार कोरे पन्ने ही लाएगी.. ...तुम पर है कि स्याही उंडेले जाने से एन पहले लिख डालो अपने हिस्से की कहानी.....
शिफ़ाली

पर रंग छोड़ जाते हैं....


उस लड़की ने मुट्ठी में भींच लिए रंग और भागने लगी...वो फागुन की दोपहरों में गलियों को नापती......सड़कों पर बेपरवाह झूमती...भाई की ढोलक पर बेपरवाह होकर नाचती....इस घर से उस घर में फुदकती भागती...चुपके से रंग आती चेहरों को...अपनों को गैरों को...उसने मुट्ठी से रंग छूटने नहीं दिए...कि जैसे इन्ही रंगों की रंगत से जिंदगी रंग जानी है....कि ये रंग उस रंगरेज को दे आएगी....कि उम्र की चूनर धानी रंग दे..ओ..रंगरेज...हर रंग उसके पास अपना तर्जुमा लिए आया ....कोई अपनाईत का...कोई भरोसे का रंग....कोई चाहत का...कोई छूटी मोहब्बत का रंग...कुछ रंग जो पल भर को मिले और रुठे...कुछ रंग चो चुटकी से चढे और उम्र भर का संग बनें.....वो भागती रही मुट्ठी में रंगों का भरम लिए....और रंग साल दर साल छूटते रहे.....कि अब वो फागुन को रंगों में नहीं ढूंढती ...उन टूटे छूटे पत्तों में तलाशती है... रंगों से सराबोर दिनों में जो छोड़ जाते हैं अपनी शाखें....

वो रंग ही कच्चा था..

वो रंग ही कच्चा था..
और रेशे इतने सख्त 
कि कोई रंग ना चढ पाया कभी..
सूर्खीं बाकी रही तो बस..
रंगरेज की खाली हथेलियों में...

बांट लेंगे हम आधा आधा....



दफ्तर से रसोई की दौड़
तुम्हारे बराबर आ जाने की बेवजह होड़
छोड़ दूंगी
मैं भी
बस तुम ज़रा कायदे में आ जाओ
इंसान के खोल में समा जाओ
मान लो ये सच्चाई
लिविंग रुम मेरा भी हक है
ये रसोई तुम्हारा भी सच है....
पर हाय मिर्च मसालों को रोज इस्तेमाल में लाते हो
रोज नए नए ढंग से
मेरे कैरेक्टर का साग पकाते हो
मैं छोड़ दूंगी
स्टेटस पर फेमिनिज्म का राग
सर्फ एक्सेल से धो डालूंगी
तुम्हे दिए अब तक के दाग
तुम भी तो थोड़ी हद में आओ
अपनी कमीज से ये ईगो वाला कॉलर हटाओ
मेरा यकीन करो
मेरी अम्मा ने हर दिन में मुझे ये रटाया है
सिर्फ एक गीत सिखाया है
लड़के लड़की में नहीं कोई फर्क
फिर भी फैमिली लाइफ में आए कोई जर्क
तो दिल से दोहराना
बांट लेंगे हम आधा आधा....
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कभी यूं भी तो हो.......

र जो मुझे ना छूना हो आसमान
छोड़ दूं जो ये ख्वाहिश कि सितारों पर हो मेरा नाम
कई रातें जाग कर लिखा अपना दीवान
मैं तुम्हारे नाम से छपवाऊं...
तुम्हारी कामयाबी पर रीझूं
तुम्हारी जीत पर इतराऊं
तुम्हारे रिकार्ड वाले मैडल
बनें मेरी भी शान
गले में पड़े काले मनकों में
मैं ढूंढू अपना मान
वट सावित्री, तीजा, चौथ
ये सारे दिन राष्ट्रीय पर्व बन जाएं
बराबरी का कोई नारा नहीं अब
मन समर्पण के प्रेम के गीत गाएं
सिंगार के आगे खत्म हो जाए मेरा संसार
तुम्हारे हर प्रहार पर लुटाओं झोली भर भर प्यार
स्त्री का पर्याय अबला स्थाई हो जाए जो
मेरे आंखों में मेरे सपने ना हों,
बस तुम्हारा ही अक्सर नजर आए तो
कभी यूं भी तो हो.......
( वुमन्स डे स्पेशल तड़का)
शिफाली....

तुम क्या समझो ...जानीं....

बिस्तर पर पड़ा
गीला तोलि‍या
हाथ धोकर छोड़ी गई थाली
पसीने की बू में तरबतर
जुराब...
सुबह चढती
शाम उतरती
चेहरे की आब
रसोई से रसोई की दौड़
शिकायतों के नए नए मोड़
त्याग की तपस्या
पूनम, अमावस्या
उलाहने की टोक
आंखों की रोक
रिश्तों की राजनीति
जज़्बे पर सवाल
पहले शह
फिर मात की चाल
कभी मोहब्बत की बातें
कभी जिरह के दौर
कद्दू से लौकी,
फिर आलू पर गौर
इसे देखो....
इसे जानों....
फिर समझो ये कहानीं...
एक चुटकी सिंदूर की कीमत...
तुम क्या समझो ...जानीं....

........शिफाली

# रेल सी गुज़र जाऊँ ..

ये जानते हुए भी... कि हर जंक्शन पर पनाह बस दो घड़ी की ही है....पलटकर वो भी नहीं देखेंगे जिन्हे उसने मुकाम तक पहुंचा दिया...स्टेशन.. राहगीर हैं... हम सफर नहीं... कितना सबर समेटे भीतर.... दोड रही है.... पटरियों पर पढ़ी किसी ने कभी दर्द की कोई इबारत....
# रेल सी गुज़र जाऊँ ..

कोशिश रहेगी कि इनके ज़ेहन में फर्क सिर्फ अच्छे बुरे का हो...


जिस दौर में लड़के लड़की के बीच फर्क का दायरा रंग से शुरु होता हो...और तू बार्बी मैं किंग वारियर्स से परवान चढते.... रसोई तेरी, रेसलिंग मेरी तक पहुंच रहा है ...,....उसी दौर की है ये दोस्ती भी...जहां फासला सिर्फ उम्र का है...तुम लड़की हो...मैं लड़का हूं कि बाउन्ड्री लाइन इस दोस्ती में आई ही नहीं ....लड़के के एक घूंसे का जवाब लड़की चार घूंसों से भी दे सकती है, सनद
रहे...,..एक दूसरे के साथ कपल डांस भी हो जाए.....और मिनिटों में हाई वोल्टेज झगड़ा भी....,ना साथ फोटो खिंचाने में कोई गुरेज...ना कंधे थाम लेने में कोई संकोच.....इस सारी बयानी के
पीछे गरज इतनी है कि देखिए........कि उम्र के साथ आई समझदारी, कैसे हमारी सहजता छीने ले जा रही है.......बचपन कितना बेफिक्र है...कितना आसान..
जानती हूं, दुनिया की हवाएं इन पर भी असर डालेंगी....कोशिश रहेगी कि इनके ज़ेहन में फर्क सिर्फ अच्छे बुरे का हो...

जिंदगी छूटी थी यूं......

वो भागती हांफती सड़क
उम्र का पुल पार कर गई
पहुंची उस पार
जहां बहुत सा अधूरा पूरा होना था
जुबां पर अटके 
अल्फाज़
कानों से उतरकर दिल तक पहुंचने थे
किताब में नहीं
अधखुली चोटी में सजने थे गुलाब
सर्द हथेलियों को
सीले हाथों में मुस्कुराना था
और आंसूओं से भींगनी थी
हल्के नीले रंग वाली तुम्हारी कमीज़
आंखों की गुस्ताखियां मुआफ की जानी थी
खोली जानी थी हालात की गिरहें...
वक्त के शिकवे शिकायतों को झील में सिराया जाना था
फिजिक्स के फार्मूले से पहले
हमें सुलझानी थी अपनी इक्वेशन्स
क्लासरुम में छिपकर लिखे गए तमाम खत
हर्फ हर्फ हकीकत हो जाने थे
इश्क, को मुकाम मिल जाने थे.....
मगर ये हो ना सका....
कि बस ख्याल था ये
एक सड़क के फासले पर
जिंदगी छूटी थी यूं......
शिफाली

भरोसा ही तो था

भरोसा ही तो था
कि तेज़ तूफान में भी नाविक थामे रहा कश्ती
पूजते रहे पत्थर कि एक दिन बोलेगा वो भी
भरोसे पर,
घर से सैकड़ों मील दूर भेजे जाते रहे बच्चे 
धुंधलके में भी घर से निकलती रहीं लड़िकयां
तुम्हारे भरोसे का हाथ थामे तो चल दी थी वो
जिंदगी के दुश्वार जंगलों में
भरोसे पर उस वक्त तक किया था इंतजार तुम्हारा
कि जब दूर देस से आने वाले सारे जहाज खाली होकर लौट चुके थे
पर तुम नहीं उतरे..
और अब तुम पूछते हो भरोसा किस चिड़िया का नाम है......
शिफाली