Saturday, November 29, 2008

पिता की सलामी

एक पिता की सलामी,....
मेरे बीमार पिता ने मुँबई में आतंकियों से हुई मुठभेड़ की कोई तस्वीर नहीं देखी....वो नहीं जानते एटीएस चीफ करकरे को, वो कमाँडो गजेन्द्र सिंह और संदीप उन्नीकृष्णन को भी नहीं जानते..1971 के युध्द का हाल रेडियों पर सुनने वाले मेरे पिता ये भी नही जानते कि अब युध्द दो मुल्कों में नहीं होता...बेकसूरों को निशाना बनाते आतंकवादी अब सीधे सीमा के अंदर घुस आते हैं...पिता नहीं जानते कि वोटों के लिये अब नेता मासूमों की लाशों पर भी सियासत करने से नहीं चूकते....वो नहीं जानते कि खबरिया टीवी चैनल आतंकवादियों और देशभक्तों के इस युध्द को अपनी जान पर खेलकर किसी हिन्दी फिल्म के सस्पेंस,एक्शन,थ्रिलर के फार्मूले के साथ पेश करते हैं...और चैन से खाना खाते...रज़ाइयों में दुबके हम,अपने अपने घरों में मिनिटों में मौत बन रही ज़िन्दगी के रोमाँच को जीते रहते हैं हर घड़ी....मेरे बीमार पिता ने मुँबई का हाल मेरी आँखों से देखा मेरी ज़ुबान से जीया ....सेना की जाँबाज़ी के किस्से उनकी सूनी आँखों में चमक ले आते हैं ...सच्चे सपूतों पर गर्व करते चौड़ा हो जाता है पिता का सीना...सैनिकों के हौसले पर मुस्कुराते हैं और देशभक्तों की शहादत पर फक्र से कहते हैं...सेना के भरोसे ही तो हैं हम और हमारा भारत...बेटा.....ये नेता तो हमारे भरोसे हैं....।

Tuesday, November 25, 2008

क्यों होती है दुनिया गोल ...
क्यों जिन रास्तों से शुरु हुए
लंबे सफर के बाद फिर
वहीं खड़े हो जाते हैं हम...
क्यों उम्र के बाद
वक्त के साथ
नहीं बदल पाता ज़िन्दगी का भी चेहरा
क्यों फिर वही एक शख्स
अपने हिस्से में पूरी बिसात लिये मिलता हैं..
और हमारे हिस्से आती है फिर सिर्फ मात
क्यों हम ही बने रहते हैं
किसी और की शह
पर चलने
दौड़ने वाले
लाचार मोहरे....
और
मरते रहते हैं रोज़,
कई कई बार,
कोई तो बताये......

Friday, November 21, 2008

याद,
फिर कौंध गई है मुझमें...
एक चेहरे से लौट आई
वो पुरानी दुनिया,..
एक इक मंज़र
मेरे सामने ज़िन्दा होता
पहले कुछ दोस्ती,
फिर अपनेपन की बात कई
और फिर इक ज़रा सी बात में
टूटे तागे...
दोस्ती दुश्मनी में ढलती गई बस यूँ ही...
दुश्मनी भी कोई आम नहीं...
बन पड़ा जो
वो सबकुछ तो किया था उसने...
ज़िन्दगी का है कोई कर्ज़
समझ भूल गई...
आज फिर
कौंध आई याद वो ही
एक चेहरे से लौट आई पुरानी दुनिया....
हाथों की लकीरों में
सुकून की पनाह नहीं ,
मंज़िल के निशाँ तलाशती
दौड़ती रहती हूँ दिन रात यूँ ही
सोचती हूँ कि माँ क्यों कहती थी...
तेरे तलवों में राज रेखा है.....