Friday, November 21, 2008

याद,
फिर कौंध गई है मुझमें...
एक चेहरे से लौट आई
वो पुरानी दुनिया,..
एक इक मंज़र
मेरे सामने ज़िन्दा होता
पहले कुछ दोस्ती,
फिर अपनेपन की बात कई
और फिर इक ज़रा सी बात में
टूटे तागे...
दोस्ती दुश्मनी में ढलती गई बस यूँ ही...
दुश्मनी भी कोई आम नहीं...
बन पड़ा जो
वो सबकुछ तो किया था उसने...
ज़िन्दगी का है कोई कर्ज़
समझ भूल गई...
आज फिर
कौंध आई याद वो ही
एक चेहरे से लौट आई पुरानी दुनिया....

5 comments:

महुवा said...

तुम्हें देखकर अच्छा लगा...इतने दिन से जानती हूं ...लेकिन तुम्हारी तारीफ में शब्द नहीं निकलते...u r too gud

श्रुति अग्रवाल said...

दोस्ती बंधी ही कच्चे धागों से होती है...टूटे फिर जुड़ भी जाए तो गांठ रह जाती है। दुआ करती हूँ कि हमारी दोस्ती कभी टूटेगी नहीं...मैं आप जैसे दोस्त को खोने से हमेशा डरूँगी..

पटिये said...

तुम जैसे दोस्तों की बदौलत ही तो है...दोस्ती ज़िन्दाबाद....शिफाली।

नीरज श्रीवास्तव said...

शाख से टूटे फूल दोबारा नहीं ख़िलते... बेमन से बंध भी जायें अगर दुनियावी गुलदस्ते के लिए... फिर भी मज़बूरी देखिये कि हर कदम उन्हीं की परछाईं से होकर गुजरता है... जिन्हें शऊर भी नहीं दोस्त कहलाने का...

राजीव करूणानिधि said...

फासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था,
सामने बैठा था मेरे पर वो मेरा न था...
कुछ यही भाव हैं आपकी कविता में....अच्छा लगा
मेरे ब्लॉग को भी कभी अपनी नज़र से खंगालिए...