Thursday, April 19, 2012

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पन्द्रह साल बाद मिले भी तो ऑनलाइन
वो देख नहीं पा रहे थे एक दूसरे को...
तो कहना भी आसान हो गया
वो जो पन्द्रह साल मे नहीं कह सका था वो
एक सांस मे कह गया
तुम्ही थी वो
जिसके किस्से सुनाया करता था तुम्हे
तुम्हारा राज़ जो महफूज़ था
वो दे दिया तुमको
चलो अब दफन कर दो सब
कहानी ख़त्म हो जाये .....

shifalee

2 comments:

नीरज श्रीवास्तव said...
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नीरज श्रीवास्तव said...

कहने भर से कहानी खत्म हो जाती, तो शायद सारी स्मृतियाँ भी बिसरायी जा सकती थीं... लेकिन इस तरह न कोई कहानी खत्म होती है और न स्मृति... बस वक्त की धूल के नीचे छुप जाती हैं यादें... बारिश की फुहार में सब-कुछ फिर ताज़ा लगने लगता है... सुंदर रचना...