Saturday, April 28, 2018

खत लिखना आपसे ही सीखा था....यहां सब कुशल मंगल है...पत्र यहीं से शुरु होता है हमेशा 
चाहे मंगल कहने को बस मंगलवार ही हो तुम्हारे पास..आपसे ही सीखा 
.नहीं बाबा, आप कोई टेंशन नहीं लेना...वाकई सब कुशल मंगल से है...
पर जाड़े के ये दिन नहीं गुजर रहे....तीन दिन हो गए 
दीदी के हाथ का स्वेटर ही पहनी हुई हों....उतारती हूं तो लगता है कि घर से दूर निकल आई हूं कहीं पहन लेती हूं, तो अम्मा के साथ सिगड़ी तापने लगती हूं बरामदे में बैठकर....
पर बाबा यहां एक ही मौसम है....बस एक मुंजमिद खामोशी .....

--
बाबा, चांदनी फूल आई होगी अब तो...
गुजरते जाड़े में आम पर बौर भी आ जाएगा....
भाई से कहना..मेरे हिस्से वाली कैरियां 
वो ही रख ले...
अबकि मैं लड़ने नहीं आऊंगी उसके पास
मैं भी क्यूं आऊं खट्टी झूठी कैरियां खाने इतनी दूर वहां
बाबा....पर आप भी झूठ क्यूं कहते थे, 
कि तू पास ही रहेगी, 
आंगन के आम जितनी पास

----
अम्मा से कहना, तसल्ली कर ले
अब कैंची की तरह ज़बान नहीं चलती मेरी 
अच्छी लड़कियां जोर से नहीं हंसती
अच्छी लड़कियां गाना नहीं गाती 
अच्छी लड़कियां खिड़की पर नहीं आती 
अच्छी लड़कियां.., सच नहीं कह पातीं
कुछ नहीं भूली हूं 
और सच कहूं कुछ याद भी नहीं है...
कि कब जोर से हंसी थी आखिरी बार...
कब जोर का गाना गाया था...
खिड़की खुल भी जाए इत्तेफाक से तो किसी दीवार के आगे 
ही खुलती है 
.......

बाबा, 
वो दादी का पलंग...अलमारी, 
वो पुराना कमजोर सोफा 
सब महफूज़ है ना घर में 
फिर मैं कैसे छूट गई हूं.....
शिफाली

( नोट-.....ताकि हमारी जिंदगी में पोस्टकार्ड और अंर्तदेशीय बनें रहें....चिट्ठी लिखिए कि लाल डिब्बा उदास है...
पुत्री का खत पिता के नाम
द्वारा- शिफाली हूं

खत लिखना आपसे ही सीखा था....यहां सब कुशल मंगल है...पत्र यहीं से शुरु होता है हमेशा 
चाहे मंगल कहने को बस मंगलवार ही हो तुम्हारे पास..आपसे ही सीखा 
.नहीं बाबा, आप कोई टेंशन नहीं लेना...वाकई सब कुशल मंगल से है...
पर जाड़े के ये दिन नहीं गुजर रहे....तीन दिन हो गए 
दीदी के हाथ का स्वेटर ही पहनी हुई हों....उतारती हूं तो लगता है कि घर से दूर निकल आई हूं कहीं पहन लेती हूं, तो अम्मा के साथ सिगड़ी तापने लगती हूं बरामदे में बैठकर....
पर बाबा यहां एक ही मौसम है....बस एक मुंजमिद खामोशी .....

--
बाबा, चांदनी फूल आई होगी अब तो...
गुजरते जाड़े में आम पर बौर भी आ जाएगा....
भाई से कहना..मेरे हिस्से वाली कैरियां 
वो ही रख ले...
अबकि मैं लड़ने नहीं आऊंगी उसके पास
मैं भी क्यूं आऊं खट्टी झूठी कैरियां खाने इतनी दूर वहां
बाबा....पर आप भी झूठ क्यूं कहते थे, 
कि तू पास ही रहेगी, 
आंगन के आम जितनी पास

----
अम्मा से कहना, तसल्ली कर ले
अब कैंची की तरह ज़बान नहीं चलती मेरी 
अच्छी लड़कियां जोर से नहीं हंसती
अच्छी लड़कियां गाना नहीं गाती 
अच्छी लड़कियां खिड़की पर नहीं आती 
अच्छी लड़कियां.., सच नहीं कह पातीं
कुछ नहीं भूली हूं 
और सच कहूं कुछ याद भी नहीं है...
कि कब जोर से हंसी थी आखिरी बार...
कब जोर का गाना गाया था...
खिड़की खुल भी जाए इत्तेफाक से तो किसी दीवार के आगे 
ही खुलती है 
.......

बाबा, 
वो दादी का पलंग...अलमारी, 
वो पुराना कमजोर सोफा 
सब महफूज़ है ना घर में 
फिर मैं कैसे छूट गई हूं.....
शिफाली

( नोट-.....ताकि हमारी जिंदगी में पोस्टकार्ड और अंर्तदेशीय बनें रहें....चिट्ठी लिखिए कि लाल डिब्बा उदास है...
शिफाली पांडेय

ये सूनी सूनी दोपहरें..
ये बासी खाली खाली दिन 
यूं लौट के आते हैं जैसे
जो बीत गया कल
आज वही 
है राग वही और साज वही 
और खुद से खुद की 
बात वही..
खुद से खुद का फिर लड़ जाना 
टकराना टूट बिखर जाना 
फिर खुद से कहना 
मान भी ले...
अब चल भी दे 
और जान भी ले...
जो बीत रहा तुझमें तू है 
ये दुनिया फानी हर सूं है...
ये लफ्ज़ तूझे देंगे मानी
जो बीत गया फिर बीतेगा
ये रात कोई तो जीतेगा ...

है राग वही और साज वही 
और खुद से खुद की 
बात वही..
खुद से खुद का फिर लड़ जाना 
टकराना टूट बिखर जाना 
फिर खुद से कहना 
मान भी ले...
अब चल भी दे 
और जान भी ले...
जो बीत रहा तुझमें तू है 
ये दुनिया फानी हर सूं है...
ये लफ्ज़ तूझे देंगे मानी
जो बीत गया फिर बीतेगा
ये रात कोई तो जीतेगा .
कुहासी सुबहें दोपहरें निगल लेती हैं 
शाम का रातों से रदोबदल हो जैसे

पूस का महीना बीत गया है 
सुनते हैं कि दिन बड़े हो जायेंगे अब 
लेकिन रहेंगे तो बेमानी ही

फिर कुछ सपने घोड़ी चढ़ जायेंगे 
और फिर मुल्ताबी रेह जायेंगे कच्चे पक्के इश्क़

उम्मीदों के मांजे और मज़बूत करेंगे अबकी फिर 
और टूटा सिरा हाथ मे लिए फिर कहूँगी खुद से 
कि अपने हाथ यही तो आना था

फिर सूरज के दिन आएंगे तो मे भी आवाज दूंगी तुम्हे 
बादलों के इस शामियाने के उस पार तुम सुन लोगे ना

वो पिछले मोहल्ले के पीपल से कई बार तुम्हारी गवाही ली है
Shifalee
जो, मैं भी जी ही लेती 
सिल्क साड़ी का सपना...
चूड़ियों में खनकना...
पायलों में ठुमकना....
तुम्हे देखती 
थोड़ी पलकें झुकाकर
फुदकती मटकती
मैं चोटी घुमाकर....
हौले हौले में गाती 
बेवजह मुस्कुराती 
मैं यूं बोलती जैसे 
चिड़िया हो चहकी
मैं ऐसे गुजरती
रात रानी ज्यूं महकी...
कि कंधा पकड़कर मैं बाइक पे आती
पहले शर्ट खींचती फिर मैं सैल्फी खिंचाती
मगर ये हो ना सका....
मगर ये हो ना सका...
और अब ये आलम है.....
कि देखूं में अपनी किताबों का सपना
कि रूटीन है मेरा लड़ना झगड़ना
कि हाथों में मैने, टू डू लिस्ट थामी
कि पैरों में हर दम ही रहती सुनामी
कि पलकों से पहले, मैं चश्मा संभालू 
ठहाकों में हंस लूं मैं जोरों से गा लूं 
कि कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी मैं
तुम्हारी ही खातिर तो जग से लड़ी मैं....

इसे देखो....इसे जानों, फिर समझो ये कहानी
इन फितूरी, औरतों की कीमत...
तुम क्या समझों जानी....
----शिफाली
धरती जिस रंग की चादर पहनें,
गुनगुनी धूप में सो जाती है....
किताब में जो महफूज़ रक्खे हैं,
तुम्हारे दिए हुए
उन फूलों का रंग भी तो वही था ना...
ये और बात कि वो फूल तुम्हारे जज़्बात की आधी बयानी रहे..
उसी रंग की चूनर ओढे 
उतरते रहे मेरी उम्र के तमाम बरस...
हां वही रंग...कि जिसे पहनकर बित्ते भर की नोनी दौड़ लगाती है...
हां वही रंग कि जिसमें, हथेली रंगती है, घर की देहरी पे छूट जाती है 
उसी रंग से रंगे थे पांव....
बाबूजी जब रोए थे ....
वही रंग जिसनें, बंजर नीदों में सपने बोए थे....
हां वही रंग फिजाओँ में लौट आया है....
मेरी लकीरों में लिक्खा....
तुम्हारे नाम का रंग

...............शिफाली