Tuesday, March 31, 2009

सर्द मौसम के गुले - शफ़्फाफ की मानिन्द,
अपने लक़ब की सी मासूम,
लहक और दिल मानूस दोनों में,
शिफ़ाली,तुम्ही हो आदाबे-अदबो-सहाफ़त

इक इस्में बाँग्ला जैसे तुम्हारी
अदा और हयात का तर्जुमान हो
जो बेनूर हैं ज़िन्दगी में कैसे भी
चाहें तो तुम उन्हे अपना रंग वक्फ कर दो

अपनी नामानिगारी से जो तुमने,
आवाज़ दी वो सदा- ए- बशर की है
धड़कते दिलों को थाम लेने वाले
तुम्हारे लफ्ज़े हरारत मैंने सुर्ख होते देखे हैं...

सर्द और तपन दोनों की हमनवाँ
क्या बेजोड़ नमूना हो तुम क़लम का,
रुदाद और खुशी हों एक जमा
क्या कोई करेगा जो तुमने किया है...

अपने नाम के मुताबिक तुम शिफ़ाली
उस रंग की रहनुमा बनी रहो
जिसमें जो कोई रंग डाल दे
और रंग ए शफ़्फ़ाफ वैसा ही हो जाये...

( मेरी तेहरीर से रुबरू होकर,मेरी तक़दीर की धूप छाँव के साथ मेरे मिज़ाज को जानने परखने वाले मेरे एक दोस्त ने मुझ पर ये एक नज़्म लिख्खी है....यूँ दुनिया में कामयाब लोग ही ज़िन्दा रहते नज़्म और कविता में उतर पाते हैं...मेरा नसीब है...कि इस नज़्म के साथ मुझे ये खुशकिस्मती बेनामी में ही मिल गई है....

Friday, March 27, 2009

हाथों की चंद लकीरों का.... क्या खेल है ये तकदीरों का

हाथों की लकीरों में नहीं,तकदीर की निशानियाँ,
बस,जूझना है, टूटना है,और फिर से दौड़ना
लोग कहते हैं वक्त होता है,
वक्त का इंतज़ार है मुझको...

Friday, March 20, 2009

साहिल पे मछुआरे भूखे

नदी पड़ी है नावो में......

पानी प्यास बढाता जाये

धूप लगे हैं छाँव में......

गुठले पड़ गये पांव में

आये जबसे तेरे गाँव में......

सुधीर

ये सुधीर की लाईनें हैं....किसी कागज़ पर नहीं उतरी मोबाइल के एसएमएस बॉक्स में यूँ ही रात की बेखयाली में सुधीर ने दर्ज कर दीं......लिखते हैं,खूब और खूबसूरत लिखते हैं.... लेकिन जो लिख्खा वो अब तक दुनिया की नज़्र नहीं हुआ ....मेरे ब्लॉग पर अब अक्सर आप सुधीर को भी पढ़ सकेंगे......।

Friday, February 13, 2009

प्रेम एक दिवसीय

दो दिलों से शुरु होती रही प्यार की कहानी तो वही है....लेकिन रुह से निकलकर इश्क अब जिस्म हो गया है.... इश्क बदला तो बदल गया इज़हार ए इश्क का अंदाज़ भी....संत वेलेन्टाइन डे की कृपा हुई तो अपने दिल की ज़ुबाँ को आवाज़ देने तय हो गया दिन भी...प्यार के सहारे बाज़ार भी चल निकला...और भगवाधारियों की सियासत भी जिन्हे मोहब्बत के इस खास दिन खिलाफत के ज़रिये मिलती हैं सुर्खियाँ....लेकिन इन सारे तमाशों को देखते हुए सोचियेगा ज़रा क्या यही प्यार है.....
याद कीज़िये ज़रा वो ज़माना जहाँ दो फूल मिलते....और दो दिलों में प्यार हो जाता.....इज़हार ए मोहब्बत की हद दिखाने में एक मुद्दत तक शर्माता रहा सिनेमा भी....लेकिन समाज में वक्त के साथ ऐसा खुलापन आया...कि सरेआम हो गये प्यार के नज़ारे...पार्कों और बगीचों में हफ्तों और महीनों में बदलने वाला प्यार.....रुह से महसूस होने वाला अहसास था कभी, अब जिस्म की कहानी हो गया... ......वो वक्त भी था जब ज़ुबाँ खामोश रहती थी...फकत बोलती थी आँखे .....और प्यार हो जाता था...ज़ुबाँ तो अब भी खामोश है...लेकिन दो दिलों की बोली बाज़ार बोल रहा है....चीख चीख कर....हिन्दी फिल्मों में खिलौना समझकर दिल टूटा करता था...यहाँ खिलौनों के सहारे दिल मिलते हैं....पहले प्यार आया....फिर प्यार में बाज़ार...लेकिन इस तरह कि अब लगता है कि अगर बाज़ार ना होता तो मोहब्बत करने वाले इश्क के इज़हार के लिये ज़ुबाँ कहाँ से लाते......पॉश के लफ्ज़ों में प्यार करनाऔर लड़ सकना जीने पर ईमान ले आना , यही होता है धूप की तरह धरती पर खिल जानाप्यार करना और जीना उन्हें कभी नहीं आया जिन्हें ज़िन्दगी ने बनिया बना दिया....पर कौन यकीन करेगा इस ज़माने में कि सबकुछ खो देने के बाद जो आँखों से आँसू बनकर छलकता है...वही तो प्यार होता है.....

Saturday, February 7, 2009

एक आवाज़,
आवाज़ों के शोर में,
वो एक आवाज़......
अपनी सी,
आठ साल की खामोशी का लंबा वक्फ़ा....
फिर उस आवाज़ की खनक
ज़ेहन से उड़ा ले गई बीतों दिनों की धूल...
हर भूल भूला दी मैंने....
और आवाज़ के साथ खिंचती चली गई....
जाने कब पहुँच गई ज़िन्दगी के उस हिस्से में
जो अब सिर्फ यादों के हवाले है
वो एक वक्त,
कॉलेज के बूढ़े नीम के साये में जब हम दोनों किया करते
हर दर्द को साझा
ग्रेजुएशन में की पत्थरों की पढ़ाई
पर हर दुख में सिसकते
फूल जैसे थे हमारे दिल....
.हर दोस्ती की तरह क्लासरुम की बैंच से ही शुरु हुआ था
हमारी दोस्ती का सफर भी...
उसकी काइनेटिक पर फर्राटा भरते
कई बार नापा पूरा शहर.....
झील के किनारों पर बातों में खड़ी करते हम रोज़
ज़िन्दगी की नई तामीर,
आज उसी ज़िन्दगी में है हम दोनों ....
उसके सपनों से कुछ कमतर उसकी ज़िन्दगी,
मेरी ख्वाहिशों से कुछ कम मेरी ज़िन्दगी....
कॉलेज छूटे बरस गुज़र गये...
लेकिन आज मालूम हुआ....
कि मेरी तरह वो भी
इम्तेहान ही दे रही है अब तक.....
वो इम्तेहान,
जिसके नतीजे कभी नहीं आते....
सच कहूँ, तुम्हारे बाद,
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मिले कहने सुनने को अपने...
लेकिन सबके चेहरों पर मौसमी परतें थीं...
छलावे की, मतलब की परतें,
कोई ऐसा दोस्त नहीं मिला
जो मेरी खुशी में पाँच रुपये के दो गुलाब जामुन ले आये
मेरे ग़म में टिफिन भी ना खाये....
सेकेण्ड हैण्ड किताबों को खरीदते कम पड़ जायें जो पैसे
तो परीक्षा के दिनों में अपनी किताब मेरे हवाले कर दे
तुम्हारे बाद जानने पहचानने,अपना कहने वालों का मेला भी मिला.....
पर तुम उस भीड़ में कहीं नहीं थीं....
आठ साल पहले की बेतकल्लुफी से कहती हूँ
तू ही मेरी दोस्त है....

Wednesday, January 21, 2009

सुनों, झील की खामोशी....

एक शहर है भोपाल,सूखती झील के साथ खो रही है जिसकी पहचान भी...नवाब चले गये तो देश और दुनिया में झीलों के नाम से जाना जाता रहा भोपाल...सिर्फ आवाम की ज़रुरत ही नहीं...झील से इस शहर का जज़्बात का नाता है...आज जब झील दम तोड़ रही है...तो बोल रही है....अपने दर्द और अपनी खुशियाँ.....भोपाल की उसी झील की ज़ुबानी सुनिये उसकी अपनी कहानी......
..................मेरे खामोश किनारों पर कई कई बार आये हो तुम......दुनियादारी से हारकर तुम हमेशा मेरे ही पास आये.... पत्थरों से जूझती टकराती मेरी लहरें तुम्हे हर बार सिखाती रही ज़िन्दगी के सबक .....मैं खामोश थी पर तुम बोलते रहे.....कभी दर्द लेकर आये मेरे पास और छलक आये तुम्हारे आँसू...कभी खुश हुए तो मेरी झूमती लहरों के साथ तुम भी झूमे,इठलाये कई कई बार...तुम्हारी प्यास बुझाती रही....बनी रही तुम्हारे शहर की शिनाख्त...आता कोई मेहमान,तो इस्तकबाल में ज़रुर होता मेरा नाम....और तुम आने वाले का झीलो की नगरी में स्वागत करते...तुम्हारे बदलते प्यार की खामोश गवाह रही हूँ मैं.....और आज तुम गवाह बन रहे हो मेरी छूटती साँसों के...

कुदरत नाराज़ होती रही...और तुम बेदर्द....सिला ये हुआ कि तुम्हारी प्यास बुझाते बुझाते मेरी हड्डियाँ निकल आईं...बढ़ते गये मेरे किनारे और इतने बढ़े कि दूर से मुझे निहारने वाले तुम मुझ पर पैर रखकर चले आये.....पर तसल्ली है कि देर से ही सही तुम्हे मेरा ख्याल तो आया....मेरे लिये तुमने अपना पसीना बहाया....तुम्हारे हाथों में पड़े छाले ये अहसास कराते होंगे तुम्हे कि तुम्हारे लिये सचमुच ज़रुरी हूं मैं....
तुम्हारी प्यास बुझाती हूँ...तो मल्लाहों की रोटी हूँ मैं....कभी मुझमें तैरती थीं ये कश्तियाँ अब थम गई हैं...और थम गया है इनका रोज़गार भी.....मेरे साथ ही सुबह से शाम कर देते ये मछुआरे भी उदास हैं....
वक्त के साथ मेरे किनारों के पार बदलता रहा सबकुछ....पर मेरा और तुम्हारा रिश्ता नहीं बदला.......ये मै नहीं,मेरी खातिर उठे ये हज़ारों हाथ कहते हैं....मेरी साँसों को थाम लोगे तुम...मैं फिर जी जाऊँगी....मुझे ज़िन्दा रखने की तुम्हारी दुआएँ कुबूल हों....पर एक दुआ मेरी भी है....इस बार तुम मेरा मोल जान जाओ....यकीन मानों तुम्हारी तरह जीना चाहती हूँ मैं भी.......तुम्हारी झील.

( झील की खामोशी को ज़ुबाँ देते लफ्ज़ मेरे हैं....लेकिन झील में डूबती साँझ की ये खूबसूरत तस्वीर मेरे दोस्त नीरज ने भेजी है)

Saturday, January 17, 2009

एक अजीब खामोशी जम गई है चेहरे पर,
कुछ कहा नहीं जाता,
कुछ सुना नहीं जाता
और सच कहूँ तो कुछ लिखा भी नहीं जाता......
अबकि
जाने क्या बात हुई है....
( कई कई बार ब्लॉग की स्लेट खाली भी छूट जाती है....जब ज़ेहन की मुश्किलें,दिल की स्याही में मिल जाती हैं....फिर कुछ कहा नहीं जाता...बड़ी साफगोई से अपनी बयानी कर दी है....जल्द फिर मिलूँगी एक नई पोस्ट के साथ, मेरा वादा है.....)