Sunday, June 28, 2015

ये पाठ जरुरी था !



प्रबोधन,संस्कार और अनुशासन,जनसंघ के जमाने से भाजपा ने अपने कार्यकर्ता को ये तीन मंत्र दिये और इन्ही के बूते सियासी दलों में भाजपा का कार्यकर्ता हमेशा अलग नजर आता रहा। लंबे समय तक विपक्ष में रही इस पार्टी के लिए  अपने कार्यकर्ताओं को सत्ता के साथ फैलने वाले बाकी संक्रमणों से बचाना तब मुश्किल भी नहीं था।  लेकिन लगातार दो बार सत्ता में रहने के बाद सादा जीवन उच्च विचार पर चलने वाले,संघ की मिट्टी से आये भाजपा के आम कार्यकर्ता के बर्ताव में भी बदलाव की बयार आ गई।कहते हैं सत्ता का सुख,अपने सुरुर के साथ गुरुर भी लाता है। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार की पहली पारी में तो पार्टी की अंदरुनी उठापटक मे ही निकल गई। उसी में उलझे रहे नेता और कार्यकर्ता। लेकिन भाजपा सरकार की दूसरी पारी में पटरी पर आई पार्टी और उसकी सरकार के बाद कार्यकर्ता से लेकर नेता तक इतनी तेजी से बदलाव हुए जो सतह पर दिखाई भी दे रहे हैं। पार्टी के नेता से लेकर एक साधारण से कार्यकर्ता तक आचार व्यवहार से लेकर जीने का अंदाज सबकुछ अब बदला हुआ दिखाई देता है। सरकार में रहने का सलीका सीखते सीखते भाजपा के नेता जाने कब उन बीमारियों के भी शिकार हो गये। अब तक जिस रोग के लिये केवल कांग्रेसियों को ही कोसा जाता था। कांग्रेस के मुकाबले खड़ा करके तुलना कीजिये तो जरा, तो देख पायेंगे कि पार्टी विथ डिफरेंस की पंचलाइन लेकर चली भाजपा में,अब कुछ भी अलग नहीं बचा। कुछ भी डिफरेंट नहीं। कांग्रेस ने कभी अपना दामन साफ होने का एलान नहीं किया तो कभी किसी ने उन पर एतराज भी नहीं किया। लेकिन हमेशा अपनी कमीज सफेद होने का दावा करती रही भाजपा के दामन पर दाग दिखाई दे रहे हैं। सत्ता में आने के साथ आई बीमारियों के लक्षण अब उभर आये हैं। लेकिन तसल्ली करनी चाहिये कि बीमारी फैले ना इसलिये समय रहते पार्टी ने इलाज शुरु भी कर दिया। भोपाल में तीन दिन चला प्रवेश प्रशिक्षण वर्ग उसी इलाज का पहला डोज था । कहते हैं बीमारी  अगर जड़ पकड़ ले तो पूरा पेड़ सूख सकता है। लिहाजा भाजपा ने इलाज भी जड़ से ही शुरु किया है। प्रदेश भर के जिलो में तैनात पार्टी के जिलाध्यक्षों के साथ जिला मंत्रियों को याद दिलाया गया पार्टी का अनुशासन और संस्कार।  शुचिता की राजनीति के पाठ पढाए गए। और साथ साथ पार्टी को अपने खून पसीने से सींचने वाले  भूले बिसरे नेताओँ के साथ भाजपा के इतिहास की भी बात  हुई। तीन दिन चले इस प्रवेश प्रशिक्षण वर्ग में किसी मैनेजमेंट क्लास की तरह नेताओं को टिप्स दिये गये कि पार्टी का चेहरा बने नेता और कार्यकर्ता सरकार के रुतबे में नहीं, सहानुभूति के साथ जनता से पेश आयें। राजनीतिक विश्लेषक की नजर से देखें तो ये पूरी पाठशाला ढाई साल बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव ती तैयारी दिखाई देती है। लेकिन उसके साथ भाजपा के इस वर्ग के पीछे वो फिक्र भी है। जिसमें कुशाभाऊ ठाकरे की पीढी के नेता ये मंजूर करने लगे हैं कि लगातार सत्ता में रहने से भाजपा भी कई बार कांग्रेस के रास्ते पर चलती दिखाई देती है। ये वर्ग भाजपा के भीतर बढी उसी फिक्र का नतीजा है। इस वक्त में जरुरी था ये पाठ। भाजपा के लिये जरुरी था अपने कार्यकर्ता को ये बताना कि उसे अलग दिखना है तो अपनी कमीज को चाहे जैसे हो सफेद भी रखना होगा। प्रयास करना होगा कि सार्वजनिक जीवन में आने के बाद लगने वाले दाग धब्बों से वो खुद को बचाये। इस वर्ग में कार्यकर्ताओँ की लिखित परीक्षा भी हुई। प्रबोधन भी हुए। अब कार्यकर्ता ने इसे कितना आत्मसात किया,ये कहना अभी मुश्किल है। लेकिन भाजपा इस मायने में सराहना की हकदार है। कि ये देश की उन चुनिदा पार्टियों में से एक है। जो मानती है कि राजनीतिक जीवन में रहने और काम करने के लिये उसकी पाठशाला भी जरुरी है। जहां नेताओं के प्रशिक्षण और प्रबोधन होते हैं।  जहां बताये जाते हैं नेता के गुण दोष। इस लिहाज से वाकई दूसरे सियासी दलों को भाजपा से  सीख लेनी चाहिये। खासतौर पर उन सियासी दलों को जहां की राजनीति में नेता की परिक्रमा से बड़ा कोई पाठ नही होता।

आइए, तबादलों का मौसम है..


सर्दी गर्मी बरसात की तरह ही अपने तय वक्त पर हर साल आता है सरकारी मौसम तबादलों का। शिक्षण सत्र खत्म हो जाने के बाद गर्मी की छुट्टियों के आस पास हर साल पंद्रह सत्रह दिन का तबादला सीजन। झुलसाती गर्मी के इन दिनों में पूरे एक पखवाड़े चलने वाले इस ट्रान्सफर सीजन में अधिकारियों कर्मचारियों की भी सांसें फूली रहती हैं। जाने कब कहां तबादले का फरमान आ जाये। जिनकी सेटिंग बैठ जाती है। वो अच्छी पोस्टिंग भी पा जाते है। लेकिन जो ये हुनर नहीं जानते। उन्हे तो ट्रान्सफर का घूंट पीना ही पड़ता है।   थोक बंद तबादलों का चलन जब से हुआ। तब ही से मंत्री और नेता से सेटिंग ट्यूनिंग की भी ईजाद हुई। और देखते ही देखते जाने कब हर साल की इस प्रशासनिक  प्रक्रिया  ने उद्योग की शक्ल ले ली। ट्रान्सफर पोस्टिंग अघोषित धंधा बन गया। नेताओँ के लिये अफसरों के लिये कमाई का वो मौसम जो साल में सिर्फ एक बार आता है। लेकिन पूरे साल का बंदोबस्त कर जाता है। ताज्जुब की बात ये है कि सबकुछ तय प्रक्रिया से ही होता है। लेकिन जैसा कि सिर्फ इस मुल्क में ही मुमकिन है। चाहे जितने नियम कायदे लगाये। सरकारी महकमों में भ्रष्ट्राचार की गुंजाइश फिर भी निकल ही आती है। पहले तबादले होते हंैं। यानि पहले डंडा। और फिर डंडे से  बचने,फँड यानि रुपयों का का फ ंडा। ताज्जुब की बात ये है कि सबकुछ तय फार्मेट में होता है। पहले तबादला किया जाता है इस उम्मीद के साथ कि जिसका तबादला किया जा रहा है। वो रुकवायेगा भी।  फिर मनचाही जगह अच्छी पोस्टिंग पाने पानी की तरह पैसा भी बहायेगा। तबादले के इस खेल में लिये दिये बगैर तो पत्ता भी नहीं हिलता। सरकारी फाइल का खिसकना तो फिर दूर की बात है। मान के चलिये जिसकी सरकार होती है उस पार्टी के अदने से कार्यकर्ता से लेकर मंत्री तक सब पूरे मनोयोग से इस काम में जुट जाते हैं। इस इंडस्ट्री में कार्यकर्ता से नेता तक सब बराबर के शेयर होल्डर होते हैं। शिवराज सरकार ने एलान किया है कि इस बार सात जून तक प्रदेश में थोकबंद तबादले हो सकेंगे। दो सौ संख्या वाले काडर में बीस फीसदी तक तबादले किए जा सकेंगे। लेकिन हमेशा की तरह तबादलों की चाबी इस बार भी सरकार के ही हाथ में रहेगी। अधिकारियों के नहीं जिले के प्रभारी मंत्रियों के हाथ में। तबादला सूची जिला स्तर पर जारी होगी। प्रभारी मंत्री की मंजूरी के बाद तीन दिन के भीतर ये तबादला सूची जारी हो जायेगी। सरकार लाख ईमानदारी के दावे करे। सरकार में भ्रष्ट्राचार पर अंकुश लगाने के कोरे बयान दे। लेकिन ट्रान्सफर पोस्टिंग के मामले में ये कहना लगभग नामुमकिन है कि इस मामले में पूरी ईमानदारी बरती जाती है,और पारदर्शिता से होते हैं सारे तबादले। और अब जबकि जिले के प्रभारी मंत्री के हाथ में है उसके जिले की चाबी। तो ये कैसे मुमकिन है कि वो अपनी मर्जी के लोगों के तबादले नहीं रुकवायेगा। आखिर वो मंत्री बना ही किसलिये है। कुछ कर्मचारी पार्टी के कार्यकताओँ के हिस्से के होंगे। कुछ नेताओं के । आखिर सरकारी कर्मचारी भी जानता है कि साल भर तक अगर किसी नेता या कार्यकर्ता से पटरी जमा ली। तो ट्रान्सफर के सीजन में सिर पर लटकने वाली तबादले की तलवार को अपने से अलग करना कोई मुश्किल नहीं। तबादले की फिक्र नहीं सेटिंग वाला कर्मचारी  मलाईदार पोस्टिंग का चिंतन करता है। असल में तबादले के इस उद्योग में बेइमानी जड़ों तक असर कर चुकी है। तो जाहिर है इसकी सफाई भी जड़ों से ही करनी होगी । दवाई भी वहीं डालनी पहले जरुरी होती है जहां जख्म गहरा हो। उ्द्योग बन चुकी इस प्रशासनिक प्रक्रिया को उसके मूल रुप में लाने के लिये पहले जरुरी है कि साल में एक बार आने वाले इस ट्रान्सफर सीजन पर रोक लगाई जाये।  जब जिस अधिकारी कर्मचारी को दंडित किया जाना हो। जिसे नवाजना हो। पूरे साल चले तबादलों की बयार।  वो भी पूरी पारदर्शिता के साथ हो। लेकिन ये सब आदर्श स्थिति के विचार हैं। सपनों की बातें हैं। हकीकत तो फिर भी यही है कि फिलहाल कमाई का मौसम पूरे शबाब पर है।  ट्रान्सफर के साथ कमाई वाली पोस्टिंग के रेट जिलों में अब तक तय हो चुके हैं। सरकारी ओहदे के हिसाब से अधिकारियों तक पहुंच चुकी है ट्रान्सफर रेट लिस्ट। और इस सिस्टम में फंस चुके कई हजार अन्ना हजारे खामोश हैं और कुछ नहीं कर पा रहे।

आईसीयू से बाहर आई कांग्रेस



वक्त लगा लेकिन मध्यप्रदेश में कांग्रेस की छूटती सांसे लौट आईं। अर्से बाद सुस्त पड़ी कांग्रेस फिर सुर्खियों में है। पीसीसी दफ्तर में हुआ बदलाव , भोपाल की सड़कों से लेकर अखबार के पहले पन्ने  तक हर जगह दिखाई दे रहा है। विज्ञापन के एक चर्चित जुमले की तरह कांग्रेस में पूरे घर के बदल डालने का वक्त आ गया है। और अपने तय वक्त यानि दस साल के कुछ पहले मध्यप्रदेश में पूरी ताकत के साथ लौट रहे दिग्विजय सिंह की मंशा भी यही है कि अबकि वो पूरे घर के बदल डालेंगे। कांतिलाल भूरिया को दी गई प्रदेश कांग्रेस की कमान और नेता प्रतिपक्ष केपद पर अजय सिंह की नियुक्ति के साथ उस बदलाव की शुरुआत भर हुई है। बयान बहना अभी बाकि है। लेकिन  कांग्रेस की राजनीति की कुंडली बांचने ये दो नेता ही काफी हैं। सड़क से सदन तक बीजेपी से मोर्चा लेने के लिये कांग्रेस में तैनात दो चेहरे । जो एक ही नेता की सरपरस्ती से आते हैं। ऐसा कांग्रेस में मुद्दत बाद हुआ है। वरना इस पार्टी में तो ये रिवायत सी बन गई थी कि सदन का नेता अपनी ढपली बजाता। और संगठन का नेता अपना राग गाता । जमुना देवी के दौर से देखिये, सुभाष यादव,और फिर सुरेश पचौरी तक,सदन में कांग्रेस के नेता अलग । उनके संघर्ष अलग । रणनीति भी अलग। संगठन के नेता अलग और उनकी अलग ही रणनीति। यही वजह रही कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस हमेशा से बिखरी हुई नजर आई। जनता दोनों पार्टियों को करीब से देख रही है। एक तरफ बीजेपी है जहां कितना ही बड़ा हो नेता पार्टी के साये से बाहर नहीं जा सकता। और दूसरी तरफ कांग्रेस जहां पार्टी से नहीं नेता के कद से कहानी शुरु होती है। लेकिन इस बार इत्तेफाक से मध्यप्रदेश में पार्टी के साथ नेता भी एक ही है। अब तक कार्यकर्ता नेता की आस्था में पार्टी को भूलकर भटकते रहे हैं।लेकिन अब ये तय हो चुका है मध्यप्रदेश में कांग्रेस कथा  राजा से शुरु होगी और राजा पर ही खत्म।। महीनों से कांग्रेस जिस फैसले का इंतजार कर रही थी। हफ्ते भर के भीतर प्रदेश कांग्रेस में हुए दो फैसलों ने प्रदेश कांग्रेस में छाया कुहासा तकरीबन साफ कर दिया। अभी तक कार्यकर्ता अपनी ही कांग्रेस की फिक्र में दुबले हो रहे थे। पर अब चिंता बीजेपी को करनी है। जो प्रदेश में लगभग खत्म हो चुकी कांग्रेस के हाल देख कर ये मान बैठी थी कि बगैर किसी मशक्कत के प्रदेश में बीजेपी अपनी हैट्रिक बना लेगी। तीन साल बीजेपी को कुछ नहीं करना पड़ा।  पचौरी खुद कांग्रेस का जितना पलीता लगा सकते थे। लगा चुके। पैराशूट से आये पचौरी बोरिया बिस्तरा समेट कर दिल्ली लौट चुके हैं। कांग्रेस अब दिग्गी का दौर देखेगी । और यही बात बीजेपी के लिये परेशान करने वाली है। नेता एक है तो जाहिर है कि अब सदन से लेकर संगठन तक कांग्रेस के फैसले एक होंगे। संघर्ष एक होगा।  कांग्रेस के सामने बस एक ही चुनौती है। ये चुनौती,अपनी ही पार्टी के उन पॉवर सेंटर्स से है। पचौरी के दौर में जिनका फ्यूज़ पूरी तरह उड़ा हुआ था। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिये कि लो प्रोफाइल कांतिलाल भूरिया प्रदेश में पार्टी के इन पॉवर सेंटर्स के आड़े नहीं आयेंगे। इम्तेहान के पहले की प्रिपेशन लीव सुरेश पचौरी ने समर वेकेशन्स की तरह गुजार दीं। अब इम्तेहान की तैयारी के दौरान ही कांग्रेस को इम्तेहान भी देना है। कुल जमा ढाई साल का वक्त बचा है। कहने को ये कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह का इम्तेहान है। लेकिन असल परीक्षा तो उस राजा की है। दस साल के राज के बाद जिसे इस सूबे ने वनवास दे दिया था। वनवास में रहते भी इस प्रदेश से दिग्गी राजा का मोह कभी नहीं छूटा। दिग्विजय सिंह के साथ  मध्यप्रदेश में दस साल पहले का इतिहास फिर लौट रहा है। दस साल बाद इस सूबे की तस्वीर में फर्क बस इतना आया है कि कांग्रेस और बीजेपी के पाले बदल चुके है। बीजेपी के पास दो बार लगातार चैम्पियन होने का हौसला है। हार के बाद खड़ी हो रही कांग्रेस के पास नई कप्तानी  के साथ काबिल कोच का आत्मविश्वास है। बीजेपी को समझना होगा कि अब कांग्रेस को सस्ते में लेना भारी भी पड़ सकता है। क्रिक्रेट की तरह ही होती है राजनीति भी आखिरी गेंद भी जीत हार का फैसला बदल सकती है। 

वृध्दश्रम जायें अब सुदर्शन



पूर्व संघ प्रमुख के सी सुदर्शन फिर बोले। सोनिया गांधी के बाद अबकि उनके निशाने पर पंडित जवाहरलाल नेहरु हैं। सुदर्शन ने नेहरु का जन्म वेश्यालय में होने का जो आपत्तिजनक  बयान दिया है। आजादी के साठ साल बाद वो केवल कांग्रेसियों के ही नहीं किसी भी भारतीय के गले नहीं उतर सकता। सुदर्शन शायद ये  भूल गये हैं कि जिस स्तर पर जाकर गाँधी नेहरु को वे  कोस रहे हैं। उस स्तर से सोचना भी छोड़ चुका है आम भारतीय। साठ साल में सिर्फ इस मुल्क की आमआदमी की जिन्दगी ने ही रफ्तार नहीं पकड़ी। सोच में भी गति आई है। बदलाव आया है। जो बीत गई सो बात गई के फँडे पर जीता है आम भारतीय । हम आज इतिहास का विश्लेषण तो करते हैं। लेकिन उसे जबरन ढोते नहीं है। हिन्दुस्तान के आम शहरी के लिये सुदर्शन के इस बयान के पहले भी पंडित जवाहर लाल नेहरु देश के पहले प्रधानमंत्री थे। और उनके इस बयान के बाद भी सामान्य ज्ञान में अक्सर पूछे जाने वाले इस सवाल के जवाब में कोई फर्क नहीं आयेगा। सुदर्शन के कीचड़ उछालने से आजाद हुए  आधी सदी बीत जाने के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरु की छवि आम भारतीय के मन मस्तिष्क में बदल जायेगी ऐसा भी नहीं है । अगर ये संघ का कोई हिडन एजेंडा है,और संघ को लगता है कि इस स्तर पर जाकर  गांधी नेहरु परिवार को कोसने से  संघ का हिंदु राष्ट्र का सपना सच हो सकता है। तो चाहे तो संघ सुदर्शन के इस तरह के बयानों को लेकर गांधी नेहरु के खिलाफ देशव्यापी अभियान चला ले। लेकिन तय  है कि इससे कांग्रेस की सेहत पर कोई असर नही होगा। ना ही इतिहास के इन  नेताओं को आम आदमी की सोच बदलेगी। फर्क पड़ेगा तो रेडी फॉर सेल्फलेस सर्विस के नाम के साथ अपनी पहचान बदलने में लगे संघ की छवि पर। संघ की उस छवि पर जिसके लिये कहा जाता है कि स्वयंसेवक केवल सेवा में यकीन करता है। प्रचार में नहीं। असर संघ की उस छवि पर पड़ेगा जिसमें कहा जाता है कि संघ केवल एक संगठन नहीं विचारधारा है। हिंदु राष्ट्र निर्माण के लिये  बनाया गया जीवनदानी कार्यकर्ताओं का एक ऐसा समूह जिसके नेता आमतौर पर टिप्पणी से भी परहेज करते हैं। फिर व्यक्तिगत रुप से किसी की चरित्र हत्या तो बहुत दूर की बात है। असल में संघ प्रमुख के पद से रिटायर होने के बाद अपने इन अनर्गल बयानों से सुदर्शन संघ की ही लाइन के समानान्तर एक ऐसी लकीर खींचते चल रहे हैं। जो आगे चलकर संघ के खिलाफ खड़ी हो जायेगी। पंडित जवाहर लाल नेहरु के बारे में ये बयान संघ प्रमुख ने किसी  आमजन की सभा में नहीं प्रबुध्द नागरिकों की गोष्ठी में दिया है। और बुध्दिजीवी के वर्ग में केवल सुदर्शन की ही नहीं संघ के लिये जो सोच है। उसमें जाहिर तौर पर इस बयान के बाद बदलाव आयेगा। क्रिक्रेट की भाषा में कहें तो सुदर्शन का बयान ही नही उसकी  टाइमिंग भी बिल्कुल गलत है। उन्होने ये बयान उस वक्त में दिया है। जब देश क्रिक्रेट की जीत में एकजुट होना सीख रहा है। जब अर्से बाद अन्ना हजारे के साथ देश खुद ब खुद गांधीगिरी के लिये खड़ा हो रहा है। भ्रष्ट्र नेताओं और भ्रष्ट्राचार के खिलाफत करते सड़कों पर आ रहा है। ऐसे वक्त में भारत के इतिहास के नायकों पर उछाली गई कींचड़ के छींटे वापिस भी आ सकते हैं। या  फिर ये मान लिया जाये कि कभी संघ को अनुशासन और संयम की सीख देने वाले सुदर्शन की जबान अब उनके बस में नहीं रही। मान लिया जाये कि ढलती उम्र अब उन पर हावी होने लगी है। लेकिन सुदर्शन की बवाल उठाती बातों पर इस तरह के खेद जता कर भी संघ अपना दामन तो नहीं बचा सकता। इतना जरुर हो सकता है कि संघ समय रहते अपने परिवार के इस बुजुर्ग को ससम्मान वृध्दाश्रम में विश्राम करने भेज दे। ये सुदर्शन की सेहत के लिये भी बेहतर होगा। और उस संघ के लिये भी मुफीद।  जो अपने पूर्व प्रमुख की फिसलती जबान से निकले ऐसे अनर्गल बयानों पर सफाई दे पाने की स्थिति में भी नहीं है।

मैच नहीं इसे जंग कहिये जनाब



भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सेमीफाइनल के बाद भारत ने मैच नहीं जंग जीत ली हो जैसे। भारत पाकिस्तान के मैच पहले भी हुए हैं। हर एक गेंद पर धड़कनें तब भी थमा करतीं। लेकिन उस वक्त ये केवल खेल होता था। खिलाड़ियों के लिये भी और मैच देखने वालों के लिये भी। लेकिन देश के आम आदमी की भावनाओं को भी कमर्शियली कैश कराने  में उस्ताद मीडिया ने अबकि क्रिक्रेट को मैदान से निकालकर सरहदों में बांट दिया। जैसे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान मोहाली में वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में नहीं युध्द के मैदान में एक दूसरे से भिड़ने जा रहे हों। मैच के पांच दिन पहले से मीडिया ने अपना खेल शुरु कर दिया। मोहाली का महासंग्राम.. महायुध्द के सौ घँटे जैसे जुमलों के साथ ऐसी तस्वीर पेश की गई कि जैसे मैच ना जीते तो हमारे खिलाड़ी और हम  जिन्दगी ही हार जायेंगे। भारत पाकिस्तान के इस मैच का माहौल बनाने के मीडिया के इस महाअभियान का मुनाफा भी खूब हुआ।  मीडिया ने इस एक मैच से करोड़ों कमा लिये। लेकिन इसी एक मैच में खो दिया उस खेल भावना को। जिस खेल भावना के बूते पूरी दुनिया को एक साथ एक मैदान में जमा करने ओलंपिक और एशियाड  हुआ करते हैं। वो खेल भावना ही तो है जो सरहदों में बंटे मुल्कों को खेल खेल में साझा आंगन दे देती है। क्रिक्रेट को जीने वाले इस मुल्क में भारत पाकिस्तान का मैच हमेशा से हटकर  रहा है। भारतीय टीम जब पाकिस्तानी टीम से मुकाबले के लिये आई। क्रिक्रेट के शौकीन भारत के दर्शकों के लिये ये मैच खास रोमांच लिये होता था। लेकिन होता वो खेल ही था। जिन्दगी और मौत का सवाल नहीं बनता था। जैसा अबकि हुआ। क्रिक्रेट के मैदान में ये मुकाबला ग्यारह खिलाड़ियों के बूते जीता जाना था। लेकिन मीडिया की बदौलत ज्योतिषियों के अनुमान के साथ पहले ही दिखाई जाने लगी जीत और हार की तस्वीर। टीवी पर दर्शकों का  भविष्य बताने वाले ज्योतिषी भारतीय टीम की कुंडली देखने लगे। मोहाली में मैच का मुहूर्त पढ़ा जाने लगा। धोनी की ग्रहदशाओं से लेकर सचिन के राशिफल तक। सारे आकलन मैच के पहले हो गये। मीडिया ने ऐसी हवा बनाई कि दस हजार में बिकने वाला मैच का टिकट पचास हजार और पंद्रह हजार का टिकट एक लाख रुपये तक में बिक गया।  समाचारों के नाम पर सिर्फ और सिर्फ क्रिक्रेट दिखा रहे इन चैनलों की बदौलत यकीनन देश में देशभक्ति की एक लहर पैदा हुई। लेकिन बड़ी अजीब सी देशभक्ति । जो एक मैच के साथ शुरु हुई थी और मैच के साथ ही खत्म भी हो गई । तिरंगा लहराया। मोबाइल से लेकर सोशल साइट्स तक जीतो इंडिया जीतो के समूहगान होने लगे। अपनी जान हथेली पर लेकर हमारी आपकी हिफाजत करने वाले इस देश के सिपाही भी मीडिया की टीआरपी जंग से नहीं बच पाये। कुछ चैनलों में सैनिक भी नाचते गाते दिखाई दिये। धोनी की टीम की इस तरह हौसलाअफजाई करते नजर आये कि जैसे देश के सच्चे सिपाही और सपूत तो ये खिलाड़ी ही हैं।  मीडिया का ही तो असर था कि मध्यप्रदेश में इस मैच की खातिर पहले विधानसभा  स्थगित हुई और फिर सरकारी बाबूओं को इस ताकीद के साथ आधे दिन का अवकाश दे दिया गया कि वे जायें और अपने घर पर भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली जंग का जायजा ले।प्रदेश में किसान बिजली कटौती से बेहाल है। लेकिन इस मैच की खातिर सरकार ने दो करोड़ रुपये खर्च करके इस एक मैच के लिये बिजली खरीदी। ताकी पूरे प्रदेश में मैच के दौरान लाइट ना जाये। और इस जंग का टीवी पर लाइव प्रसारण लोग देख सकें।  भारत पाकिस्तान के इस मैच के युध्द में बदल जाना केवल सड़कों पर पसरा सन्नाटा नहीं है । ना मैच की हर गेंद पर चढता उतरता रोमांच। खेल के जंग में बदल जाने का असर है  युवराज का पहली गेंद पर आउट हो जाना।  पाकिस्तानी टीम के मिसबाह , युनूस खान, और कामरान अकमल हाथ आया मास्टर ब्लास्टर का विकेट चूक जाना ये बता रहा था कि  ये खेल के महायुध्द में बदल जाने का दबाव है। जो खिलाड़ियों को खुलकर खेलने नहीं दिेता। करो और मरो की तरह खेली दोनों टीमें। इंडिया मैच जीत भी गया। मीडिया की मोहाली का मैदान नहीं महासंग्राम हमने जीत लिया। लेकिन जरा सोचिये जरा खेल तो हम फिर भी हार ही गये। 

जात की बात


हिन्दुस्तान वो मुल्क है..जहाँ हर बात जात से ही शुरु होती है। जात से संबोधन। जात से सत्कार। और जात से तय होती है ब्याह संबंधों की  बात। यही वजह है कि सियासी दलों के लिये जातियाँ राजनीति का विषय बन गईं। देशभक्तों के  इस देश में सिर्फ हिन्दुस्तानी होना काफी नहीं है। अपनी पहचान के लिये जात का होना भी जरुरी है। इसी जाति  के आधार पर अब जबकि हमारी आपकी गिनती होने जा रही है तो जाति की ही बात पर उठ रहे हैं सवाल। दो खेमें बंट गये हैं। एक वो लोग हैं जो जाति की जनगणना के हक में खड़े हैं। इस दलील के साथ कि अगर जातियों की गिनती हो जायेगी। तो दलितों की राजनीति करने वालों की हकीकत सामने आ जायेगी। अभी तक दलितों और पिछड़ों की आबादी को लेकर जो हवा हवाई दावे किये जाते रहे। उनके बजाये अब सामने होंगे जातियों के सही सही आँकड़ें। साठ साल से जाति पात के भेद को खत्म करने के कितनी ही बातें की गईं। लेकिन इस देश में आज भी अदनी सी नौकरी में भी जाति का कॉलम भरना  ज़रुरी होता है। असल में भारत की तासीर ऐसी है कि इस देश के गुणधर्म जाति और सम्प्रदाय के आधार पर ही तय होते हैं। तो फिर इसमें कोई बुराई नहीं कि जाति के आधार पर ही हम सबकी गिनती भी हो जाये। इससे सरकारी योजनाओँ को आमजन तक पहुंचाने के साथ, आरक्षण नीति के लिये भी सरकार को जातियों की सही जानकारी मिल जायेगी। लेकिन जाति पूछकर की जा रही ये गिनती उस सर्जरी की तरह है। जिसमें इलाज के साथ शरीर के कुछ हिस्से का नुकसान होना तय है।  जाति के आधार पर गिनती होगी तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जातिवाद की सोच को भी बढावा मिलेगा। और समाज जाति के आधार पर बंट जायेगा। ज़ाहिर है अभी तक धर्म के मुताबिक बनता रहा पॉलीटिकल पार्टियों का वोट बैंक। अब जाति के अनुसार बने। ये देश के सामाजिक ढाँचे के लिये भी खतरा है।लेकिन अपने ही घटक दलों के एक राय ना होने के बावजूद यूपीए की सरकार ने  जाति आधारित जनगणना को आखिर मंज़ूरी तो दे ही दी। बीजेपी ने भी आखिरकार इस फैसले को मंज़ूर कर लिया। हाँलाकि बीजेपी जिस ज़मीन से आई है वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इसका कड़ा विरोध कर रहा है। लेकिन इस सबके बावजूद इसी जून महीने से जाति की जनगणना शुरु हो रही है। जाति पूछकर होगी हिन्दुस्तान के आम आदमी की गिनती। देश के सर्वधर्म समभाव के चरित्र को बचाये रखने के लिये ये बेहतर होता कि जिस तरह 1931 के बाद से आज तक जाति से गिनती नहीं की गई।  दस साल बाद हो रही इस जनगणना में भी इस गणना को स्थगित ही रखा जाता है। बेहतर होता कि जाति के बजाये इस देश की आर्थिक स्थिति का आँकलन किया जाता। जिससे इंडिया शाइनिंग और हो रहा भारत निर्माण जैसे सियासी नारो के शोर में इस देश की सच्ची तस्वीर सामने आ जाती। और हम जान पाते कि देश को विकास की राह पर लाने अभी और कितने कदम चलने बाकी हैं। मुल्क की तरक्की का पैमाना मुँबई दिल्ली का बीएमडब्लू में सैरसपाटा करने वाला हिन्दुस्तानी नहीं है। ये तय होता है,बरेली,बासौदा,मुज़फ्प्फनगर में रहने वाले उस आम आदमी से जो आज भी बैंक की किस्तों पर सुनहरी ज़िन्दगी का ख्वाब बुनता है। ये देश का वही आम आदमी है। जो जात में यकीन रखता है। जो जात से संबोधन और सत्कार करता है। अब अपनी जात के साथ ये मुल्क की गिनती में आयेगा।

ये बदमिजाज मौसम




मौसम बेईमान होता है कई बार गानों में सुना भी और जब कभी सूखा ही बीत गया  सावन या फिर जाड़े की रातें भी सर्द ना हुईं तो तंजिया लहजे में हमने कह भी दिया कि, अब मौसम पर ईमान नहीं रहा। लेकिन ये पहली बार है कि हम मौसम की बदमिजाजी भी देख रहे हैं। वाकई हमारी दुनिया में एक सिर्फ मौसम ही तो था कि जिसका भरोसा था हमें। यकीन था कि चाहे जो हो जाए, जून के दूसरे हफ्ते से पड़ती फुहारें बता ही देंती हैं कि सावन भी बस अब आने को है। और इधर बसंत पंचमी के बाद से कंपकंपाती सर्दी के दिन लौटने लगे जाते थे। खुद ब खुद तय वक्त से होता था सबकुछ। गुलाबी सर्दियों के साथ फरवरी के आखिरी दिनों में सूनी दोपहर में कोयल की हांफती सी आवाज और आम के पेड़ों पर उतरता बौर तस्दीक कर देता था कि अब दिन बड़े होते जाने हैं। दिन तो अब भी पहले से कुछ बड़े हो गए हैं, लेकिन दिन बदले नहीं है अब तक। गुलाबी ठंड की रवानगी तो छोड़िए कड़ाके की ठंड के दौर भी लौट लौट कर आ रहे हैं। मुद्दत बाद इस कदर बिगड़ा है मौसम का मूड कि छै दिन में चार मौसम बदलते दिखाई दे रहे हैं। और कभी कभी तो दिन के ही कुछ घंटो में सुबह और शाम के फासले में ही दो मौसमों का बदलाव दिखाई दे जाता है। सुबह खिली धूप कहती है कि अब जाड़े बीतने को है। लेकिन शाम ढल भी नहीं पाती कि बरसात की झड़ी लग जाती है। झड़ी भी ऐसी वैसी नहीं, सर्द दिनों में ठंडी हवाओं में लिपटी झड़ी की के साथ ओलों की बरसात। यानि सुबह गर्मी दोपहर जाड़ा और शाम ढले तक मानसूनी सी बरसात। एक दिन और तीन मौसम। मौसम का हर रंग देख चुके बुजुर्ग भी हैरान हो गए हैं कि मौसम की ये शक्ल तो कभी नहीं देखी थी। बादलों की चाल हवाओं का रूख पकड़ने वाले मौसम विभाग के पास भी बीते 88 साल में भी कोई ऐसा दिन नहीं मिलता कि जब जाड़े के दिनों में मध्यप्रदेश जैसे मैदानी इलाकों में आसमान से ओलों की शक्ल में बर्फबारी हुई हो। कुदरत खफा सी हो गई लगती है। कि जैसे किसी इंसान से तंजिया लहजे में कहते हैं उसी अंदाज में मौसम को सुनाए जा रहे हैं ताने. कि अब बस भी करो। और फिकरे कसे जा रहे हैं कि मौसम तुम तो ऐसे ना थे। वाकई कितना पाबंद था मौसम, सही वक्त पर गर्मियां बीतती थी ,वक्त से जाड़े बीत जाते थे। लेकिन अब सब गड्डम गड्ड हो गया है जैसे। कि जैसे अलग अलग मौसमों के रंग किसी ने मिलाकर फैला दिए हों जमीन और आसमान पर।  कि अब अलग करना मुश्किल है कि बरसात के महीने कौन से कहलाएंगे, जाड़े के दिन कौन से और किन महीनों में गर्मियां दस्तक देंगी। क्योंकि जब जाड़े के भी बीत जाने के दिन हैं, तो वहां बरसात ही कहां लौटी है अब तक, फिर ये कहना तो और भी मुश्किल है कि गर्मियों की सुस्ताती दोपहरें आनें में अभी कितना और वक्त लगेगा। अखबारों से लेकर सोशल साइट्स तक देखिए तो मौसम ही सुर्खियों की जगह समेटे हुए है। अखबरों की हेडलाइन्स में मौसम कई कई बरसों के रिकार्ड तोड़ रहा है। तो सोशलसाइट्स के स्टेट्स कह रहे हैं, मौसम ने तो नेताओँ को भी मात दे दी , देखिए तो बात बात पर पलटी खा जाता है।  पल में तोला रहता है तो पल में ही माशा हुआ जाता है। मौसम को बेईमान तो हम पहले ही कह चुके थे अब बदमिजाज भी कह लीजिए इसे। लेकिन मौसम की इस बदमिजाजी की वजह तलाशने जाएंगे कि तो आखिरी सिरे पर खुद को ही खड़ा पाएंगे। ये मौसम का बिगड़ा मिजाज हमारी ही बदसलूकियों का ही तो नतीजा है।  हमने ही तो की थी ना कुदरत से छेड़छाड़, लीजिए अब मौसम भी हमसे बदमिजाजी कर रहा है।