Wednesday, July 23, 2008

सांसदों मे अटकी थी सरकार की साँसे,पल पल बदलता सियासत का पारा,और मुल्क टीवी पर दलबदलू,पलटू नेताओं, पर नज़रें जमाये था.....सरकार गिरी क्या...पूरे दिन हर जुबान पर यही एक जुमला.....पर इस मुल्क मे एक मुल्क और भी था... सरकार से बेपरवाह मुल्क,वो मुल्क जिसके पेट का सवाल किसी सरकार से हल नही होता ,ऐसा नही की सियासत से इसका कोई वास्ता ही नही,नेताओं की सभाओं मे भीड़ बनकर ये भी जाता है....लेकिन कार्यकर्ताओं की फेंकी हुई झूठन खाने...ये वो मुल्क है जिसकी बढती आती खाली हथेली, कार मे इतराते अमीरों के कॉच चढवा देती है.... हर नेता चुनाव मे इस मुल्क की परवाह करता है...लेकिन चुनाव बाद ये मुल्क भाषणों के साथ नेताओँ के दिमाग से भी उतर जाता है....ताज्जुब होता है लोकतंत्र में ये ही वो मुल्क है जो सूरज की पहली किरन के साथ वोट देने जाता है,...और सरकार बनाता है।

Wednesday, July 16, 2008

मेरी चैनल दोस्त का आज फ़ोन आया उसने पूछा यार भगवान् पर कोई कहानी बता ना,अभी तक हम ख़बरों पर बातें किया करते थे ,इंसानों की खबरें,हमारे आस पास जो अनदेखा अन्जाना,अनचीन्हा,उनकी खबरें,टी आर पी का खेल देखिये हम भगवन की ख़बर लेने लगे.छोटे थे तौ माँ कहती थी,उपरवाला सबकी ख़बर लेता है,तब वो भी कहाँ जानती थी, की टीवी वाले एक दिन उपरवाले की भी ख़बर ले लेंगे.उस पैर गज़ब ये की अब ख़बरवाले ही बताएँगे की किस भगवन की टीआरपी कितनी है.अभी ४ ,६ महीने पहले तक शनिदेव का हल्ला था,लेकिन अब साईंदेव का बोलबाला है.शिर्डी में और उनके भक्तों के दिलमें तौ साईं पहले से हैं.क्या हुआ जो कैमरे की नज़र अभी पड़ी.बाबा तौ वैसे ही हैं लेकिन साईं के सहारे चेनलों की नैय्या पार लग गई. बाबा भी सोचते होंगे जब इतने भक्तों का रोज़ भला करता हूँ तौ बेचारे ख़बरवालों नए क्या बिगाडा है...अब और इन्तेज़ार नही यही दौर जारी रहा,तौ एक दिन सत्यनारायण की कथा भी ख़बर बनेगी.और सूतजी किसी चैनल के स्टूडियो मे मोर्चा संभाले,टीवी भक्तों को विष्णु भगवान् की कथा सुनकर कह रहे होंगे,कलयुग मे विष्णु भगवान् टीआरपी देव के रूप मे जाने जायेंगे.अब जो देश भगवान् भरोसे है चैनल भगवन भरोसे हो गए तौ क्या बुरा है.

Thursday, July 3, 2008

थोडी सी हँसी,कुछ आँखों की बातें
और बात बन जाती है
आसान हो जाती है हर मुश्किल
इसे पैंतरा कह लीजिये,
या दुनिया को उसी के अंदाज़ मे जितने का मंत्र
लेकिन संघर्षों की सियाही मे ख़ुद ख़त्म हो जाने से आसान है ये ,
देखती हूँ कोई ज़रूरी नही
जूझना,लड़ना, सीखना
सिर्फ़ और सिर्फ़ लड़की होना काफ़ी है.....


Monday, June 23, 2008

दुनिया की ख़बर करते अपनी ख़बर नही दे पाई ,इनदिनों नई नौकरी की मस्रुफिअत दिल की बात करने का मौका नही दे रही..बहुत कुछ लिखने का दिल चाहता है ...लेकिन ऐसी मुश्किल मे हूँ की कुछ नही कह पाती लेकिन ये हालत बहुत दिन नही रहेंगे...इंशाल्लाह जल्द लौटना होगा.

Saturday, May 17, 2008

मोहल्ला.......,मेट्रोज़ में अब इस पर कॉलोनी नाम की कलई चढ़ गई...लेकिन इस मोहल्ले की बात ही और है... रोटी पानी की भागदौड़ में,वो अपनापन और सुकूँन देने वाला मेरा मोहल्ला.... इधर हफ्ते भर पहले जब माँ के घर जाना हुआ....तो देखा मेरा मोहल्ला खाली हो रहा है....बाबूओं की बस्ती खाली कर देने के सरकारी फरमान के बाद...रोज़ एक घर एक ट्रक में उँडेला जाता है....एक ट्रक में एक टूटी अलमारी,पलंग,बरतन ही नहीं जाते....यादें भी जा रही हैं...बचपन जा रहा है...मध्यप्रदेश बनने के बाद छोटे छोटे गाँवों कस्बों से इस शहर में आकर अपने संघर्ष साझा करने वाले मेरे पिता के साथी जा रहे हैं....मेरे कई सारे चाचा जा रहे हैं....दो चार साल बड़े वो भाई जा रहे हैं...जो खुद ही मोहल्ले की बेटियों की हिफाज़त करने की जवाबदारी ले लिया करते थे...सरकार की नज़र में बूढ़े हो चले इस घर में ही तो मेरे पिता बूढ़े हुए....और उनका बेटा मेरा भाई खुद पिता बन गया...मित्रा बाबू का वो मकान भी खाली हो गया...जिसमें बूबू पाकू के साथ मैंने घर घर खेलना सीखा था....गृहस्थी का पहला सबक था वो खेल...दूध से जले हाथ पर मरहम लगाने वाले निगंम अंकल मकान छोड़ने से कुछ दिन पहले दुनिया ही छोड़ गये...लेकिन टिमी लिमी जा रही हैं...मुझसे बहुत छोंटी...मेरी दोस्त जिनकी बदौलत मेरा बचपन उम्र बीत जाने के बाद भी बरकरार रहा...गर्मियों के दिनों में स्कूलों की छुट्टियाँ लगने के बाद हमारे मोहल्ले में बेटियाँ भी माँ के घर लौट आती हैं...अबकि अपने घर मोहल्ले दीदी आखिरी बार आई हैं...और अपनी आँखों के आगे उस घर आँगन को उजड़ते देख रही हैं... जिस घर में उनके सपनों की बारात आई थी...जिस घर से उठी थी उनकी डोली....अब पिता की उम्र भर की कमाई के बंगले कहाँ बन पायेगा माँ का घर...इस छोटे से घर में एक कमरे की कमी हमेशा होती थी...लेकिन कभी मेहसूस नहीं हुआ कि बड़ी हवेलियाँ भी उस छोटे से मकान की जगह नहीं ले पाएंगी...एक और बात हवेलियों बंगलों में अब सब अपनी अपनी हैसियत से बड़े छोटे हो जायेंगे...मेरे मोहल्ले के उन झाड़ियों में सिर दिये मकानों में सब एक थे...सबके घर एक से,दीवारें एक सी...और आँगन एक से...दिवाली की खुशियाँ एक सी...होली के रंग एक से...पर अब सब बदल जायेंगे...पता नहीं जब मेरे घर की छाती पर खड़ा होगा मल्टीप्लेक्स तो मेरी नानी के लगाये आम का क्या होगा....नन्ना के घर के जाम का क्या होगा....और आँगन में लगी उस नीम का क्या होगा...जिसकी छाँव में हम सात भाई बहनों ने स्कूल से कॉलेज तक खत्म किया...अम्मा के सामने तो बावन साल जैसे किसी फिल्म के फ्लशबैक की तरह गुज़र गये...कहती है...अभी तो आये थे ग्वालियर से...घर छोड़ के जाने की घड़ी भी आ गई...सरकार के लिये होंगे सिर्फ साऊथ टीटी नगर...नार्थ टीटी नगर के बंटवारे में भोपाल की बाबूबस्तियाँ....लेकिन हमारा तो ये मोहल्ला है....खेलना कूदना...लड़ना जूझना, मोहब्बत सिखाने वाला मोहल्ला....कमल गुड्डू का मोहल्ला...जोशी शर्मा का मोहल्ला....मेरा मोहल्ला ....जहाँ इनदिनों ट्रकों में भरकर सिर्फ सामान नहीं,ज़िन्दगी के सुनहरे दिन जा रहे हैं...

Tuesday, May 13, 2008

संबंधों की घनी बुनाई में
बाहर रह गया एक छोटा सा तागा
सिरा जो़ड़ती चली गई
उधड़ता ही गया संबंधों का ताना बाना
मुझे भी सालों लग थे इसे बुनने में,
एक एक रिश्ते की सलाई पर
करती रही जज़्बातों को दो का चार
इन्ही में दो उल्टे तीन सीधे भी पड़े
कुछ अनबुने छूट भी गये...
उन्ही में से हैं ये कुछ धागे
उधड़ गये हैं...
सिरे से टूट गये हैं...
जोड़ती हूँ तो गठान पड़ती है...
सोचती हूँ कि छोड़ दूँ इनको.......

Saturday, April 26, 2008

ऑपरेशन तितली....तितली के साथ ,ऑपरेशन जैसा चीरफाड़ का लफ्ज़ तितली की खूबसूरती पर फिदा जज़्बाती लोगों को अजीब लग सकता है...लेकिन खबरों की दुनिया में...टीआरपी की होड़...और भेड़चाल पत्रकारिता की दौड़ में...ये खूब चलता है....तितली उड़ी उड़ के चली...चैनलों ने कहा, आजा मेरे पास तितली कहे चल बदमाश...ये किस्सा उस खुशकिस्मत तितली का है...जो किसी संवेदनशील कार मालिक की कार के वाइपर से जा टकराई....यूँ तितलियों काकरोचों और चींटे चीटियों की शवयात्रा हमारे हाथों और पैरों तले रोज़ निकलती हैं....लेकिन टीवी चैनलों पर आने वाले भाग्यवक्ताओं की ज़ुबान में इस तकदीर वाली तितली की बात और है...कार के वाइपर से तितली के बाँय़े पंख में गंभीर चोट आई...टक्कर इतनी जबर्दस्त थी कि तितली कुछ वक्त के लिये तो बेहोश हो गई...फिर जब आँख खुली तो देखा वो इस वक्त उससे पूरी सहानुभूति रखने वाले कार मालिक की हथेलियों पर पसरी है...एक पल को तितली रानी कुछ समझ भी नहीं पाई कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है...फिर पता चला कि ये अस्पताल है...अब रोज़ बागों में बच्चों के हाथों अपनी कई बहनों माँ मौसियों और नानिओँ को मसलते मरते देख चुकी तितली क्या जाने अस्पताल....लेकिन भाग्य जो दिखाये...अब वो डॉक्टर के मेहफूज़ हाथों में भी पहुँच गई...ये और बात है कि डॉक्टर साहब को घायल तितली के इलाज का कोई तर्जुबा नहीं था...डॉक्टर साहब ने प्रयोगधर्मिता का परिचय दिया...फेवीकॉल के मज़बूत जोड़ वाली फेवीक्विक से पंखों को जोड़ दिया...डॉक्टरी पेशे पर आँच ना आये तो साथ में एन्टीबॉयोटिक भी लगा दी...और फिर तितली रानी को पंद्रह मिनिट आराम करने अकेला छोड़ दिया गया....अच्छे मरीज़ की तरह तितली रानी ने पंद्रह मिनिट बाद आँखें खोली...और बगैर फीजियोथेरेपिस्ट का सहारे लिये उड़ना शुरु भी कर दिया...पहली उड़ान भी सीधे डॉक्टर के एप्रिन तक...खैर तितलियों के समाज में इस ऑपरेशन के बाद इंसानों के लिये सहानुभूति जागी हो या नही...लेकिन हम टीवी वालों की जमात ने तितली के ऑपरेशन से एक दिवसीय टीआरपी की जंग तो जीत ही ली...तो अब जब कभी आप कहीं से गुज़रें तो ख्याल रखें...इंसान गिरते पड़ते रहते हैं...कोई तितली कोई काक्रोच चींटी...नज़र आ जाये तो उसे तुरत जानवरों के डॉक्टर के पास ले जायें...खुद टीवी पर आकर शोहरत पायें और हमारी भी टीआरपी बढवायें......